
वो गली वो मकान
मेरे पिता तुल्य भाई साहब
रामप्रसाद जी त्रिवेदी के
दो शब्द ही मेरी कृति की
सार्थकता हो गई
पढ़ा उन्होंने कुछ
अस्वस्थ होने के
बावजूद पूरी निष्ठासे
बहुत अच्छा लिखा हैं
सच्चा लिखा हैं
बहुत अच्छा लिख लेते हो
ईश्वर कृपा बनी रहे
धन्य हुआ लेखन
सृजन प्रणाम उन्हें
प्रणाम आराध्य रूह को
की सभी को सुख सुकून
दे रही है
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्यप्रदेश




