
बिन सूना लगता जीवन, सूना हर उत्सव-पर्व है,
मन के आँगन में बस छाया विरह-वेदना का गर्भ है।
चाँद गगन में हँसता फिर भी, आँखों में बरसात रही,
तेरी स्मृतियों की सरिता में, मेरी हर दिन बात बही।
पवन सुनाए तेरे किस्से, कोयल तेरा नाम कहे,
सूनी राहें तुझको ढूँढ़ें, मन व्याकुल संदेश गहे।
रात जगाए मीठी यादें, नींद न पलभर पास आए,
तारों से पूछूँ मैं तेरा, कोई उत्तर नहीं बताए।
मिलन-आस की ज्योति जलाकर, दिन-रात प्रतीक्षा करता हूँ,
विरह-अग्नि में तपकर भी मैं, प्रेम-पुष्प सा खिलता हूँ।
एक झलक मिल जाए तेरी, जीवन फिर मुस्काएगा,
विरह की यह गहन वेदना, मिलन-सुधा बन जाएगी।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार



