साहित्य

मत्तगयंद सवैया

डॉ उषा अग्रवाल

भगवान दया करना तुम,

जीवन पार सदा करते हो।

कष्ट सदा मन के हरते जब,

प्रीत सदा मन में भरते हो।।

पालक हो जग के तुम तो अब,

कौन हरे हरि ये मन पीड़ा।

प्रेम भरा जग में इतना तब,

सत्य रहे मन का यह वीणा।।

 

 

संकट से भगवान बचा कर,

खेवन हार दया करते हैं।

सोच रही तुमसे कहती अब,

बात सही मन में धरते हैं।।

देख दशा मन की अब तो यह,

शीश झुका चरणों गिर जाते।

मोद भरे मन में रहते जब,

आप कृपा निज ही कर पाते।।

 

स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

छतरपुर मध्यप्रदेश

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