साहित्य

जब भी देखता हूं आईना

संजय मृदुल

सा ही दिखाई देता हूं

झूठा, मक्कार, स्वार्थी

खुश रखने के लिए ख़ुद को

सबको दुख देता हुआ

दूसरों की तकलीफ़ में

अट्टहास करता हुआ

मेरे भीतर का दानव

चेहरे पर दिखाई देता है

बहता हुआ अश्क किसी का

दरिया दिखाई पड़ता है

मीठी मुस्कान से अपनी

दिल जीतने का प्रयास करता हूं

भोंक कर छुरा पीठ पर

असलियत अपनी बयान करता हूं

आईना है कि झूठ नहीं बोलता

मैं अक्सर मुखौटा लगाए रखता हूं।

©संजय मृदुल

रायपुर

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