
की भागती-दौड़ती, शोर से भरी दुनिया में मनुष्य बाहर सब कुछ जीत रहा है, लेकिन भीतर ख़ुद से हार रहा है। वह तक़नीक से जुड़ रहा है, पर अपनी धड़कनों से कट रहा है। ऐसे विक्षिप्त होते आधुनिक समाज में योग कोई शारीरिक कसरत या केवल आसनों का समुच्चय नहीं है, बल्कि यह बिखरते हुए इंसानी वजूद को समेटने वाली एक मूक, सूक्ष्म और अत्यंत मार्मिक ‘अंतस की क्रांति’ है।
टूटते हुए मन का अदृश्य मरहम है यह। बाहर से हंसते-मुस्कुराते चेहरों के पीछे आज अवसाद, अकेलेपन और अनकहें आंसुओं का एक समंदर छिपा है। इंसान बंद कमरों में अपनी ही सांसों से अजनबी होकर जी रहा है। यहाँ योग का चमत्कार किसी जादू की तरह नहीं, बल्कि एक माँ की थपकी की तरह काम करता है। जब एक अशांत व्यक्ति चटाई पर बैठकर अपनी आँखें मूंदता है और एक गहरी, सचेतन सांस भीतर खींचता है, तो वह केवल ऑक्सीजन नहीं ले रहा होता; वह अपने बिखर चुके वजूद के टुकड़ों को वापस समेट रहा होता है।
प्राणायाम की हर एक धीमी गति उस कड़वाहट और तनाव को शरीर से बाहर धकेलती है, जिसे इंसान सालों से समाज के डर से पी रहा था। योग का पहला चमत्कार यही है,यह हमें ख़ुद के रोने, थकने और फ़िर से संभलने की आज़ादी देता है।
‘चटाई’ से ‘जीवन’ तक़ का सफ़र है यह सफ़र। हम अक़्सर योग के चमत्कार को केवल बीमारियों के ठीक होने या शरीर के लचीलेपन से आंकते हैं। लेकिन इसका असली सूक्ष्म चमत्कार तो चेतना के धरातल पर होता है। क्या चमत्कार केवल यह है कि कोई अपनी रीढ़ की हड्डी को कितना मोड़ सकते है? नहीं। असली चमत्कार तब होता है जब योग हमारी ‘सोच’ को लचीला बना देता है। जब हम विपरीत परिस्थितियों में भी क्रोधित होने के बजाय मौन और गहरे होकर मुस्कुराना सीख जाते हैं, तब समझें कि योग घटित हो रहा है।
यह शरीर को साधने से शुरू होकर, विचारों को शुद्ध करते हुए, आत्मा के उस कोने तक़ पहुँचता है जहाँ केवल शांति का वास है। यह ‘अहंकार’ (इगो) को विसर्जित कर ‘सहानुभूति’ ( एम्पथी) को जन्म देता है।
प्रकृति से पुनर्मिलन करवाता है योग।
आज का मानव प्रकृति का विजेता बनना चाहता है, जबकि वह उसका एक अदना सा हिस्सा है। योग हमें इस ब्रह्मांडीय सत्य से जोड़ता है।
जब हम ‘शवासन’ में लेटते हैं, तो वह केवल आराम नहीं, बल्कि इस अहंकार की प्रतीकात्मक मृत्यु है कि “यह दुनिया मेरे बिना नहीं चल सकती।” वह समर्पण है।
जब हम ‘सूर्य नमस्कार’ करते हैं, तो वह मात्र एक व्यायाम नहीं, बल्कि उस असीम ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता की प्रार्थना है जो इस सृष्टि को चला रही है।
अत: समय यह है कि हम स्वयं की ओर लौटें।
योग किसी दूसरे को बदलने का साधन नहीं है, यह स्वयं को जानने और ख़ुद से ही दोबारा प्रेम करने की एक मार्मिक यात्रा है।
यदि आज का मानव अपनी व्यस्तता के मरुस्थल में से मात्र 20 मिनट निकाल कर इस मूक क्रांति का हिस्सा बन जाए, तो अस्पतालों के बिस्तर कम पड़ जाएंगे और घरों में संवाद बढ़ जाएंगे। योग का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बाहर बहुत ढूंढ चुके, अब जरा भीतर लौट आओ। चमत्कार कहीं बाहर नहीं, तुम्हारी अपनी सांसों के भीतर तुम्हारा इंतजा़र कर रहा है।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




