साहित्य

मनहरण घनाक्षरी

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

सरयू को छोड़कर, मुँह को मोड़कर,

पिता-वचन निभाने , वन को जाइए।

संग सिया सुशील हैं, लक्ष्मण भी अधीर हैं,

त्याग और तपस्या का, पाठ ये पढ़ाइए॥

वन में गमन किया, धर्म का वरण किया,

विपदा के अँधेरों में, दीप-सा जगाइए।

ऋषियों के हितकारी, दीनों हित उपकारी,

मर्यादा श्रीराम जी को, शीश ही नवाइए॥

 

चित्रकूट के धाम में, पंचवटी थी ग्राम में,

प्रेम औ सदाचार का, भाव ही बसाइए।

रावण के घमंड को, अधर्म भरे स्तंभ को,

धनुष-बाण शक्ति से, धूल में मिलाइए॥

भक्त जनों के प्राण हैं, करुणा की तो खान हैं,

राम-नाम अमृत को, नित्य ही पिलाइए।

जीवन के हर पल,अंतर्मन बसे बल,

भाव भरे प्रणाम से, राम को रिझाइए॥

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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