की फीस के लिए अपनी चाय फीकी कर दी,
नई कमीज की चाहत को हँसकर पुरानी कर दी,
दिन भर धूप में तपकर जो रोटी कमाता है,
रात को बच्चों के सपनों पर चुपचाप मुस्कुराता है।
उसकी थकान कभी आँखों में दिखती नहीं,
शिकायत का एक लफ्ज़ जुबाँ पर टिकता नहीं,
माँ के आँचल की बातें तो दुनिया करती है,
पर बाप की टूटी चप्पल कोई कहाँ पढ़ता है।
त्योहार पर सबके लिए तोहफे लाता है,
अपने लिए बस यही कहता है, “अगली बार”,
बेटी की विदाई पर जो पत्थर सा हो गया,
वो भीगी पलकों का समंदर भीतर सो गया ।
बच्चों की उड़ान के लिए परवाज़ खुद की छोड़ दी ,
उनके नाम के आगे अपनी पहचान मोड़ दी ,
पिता बोलता नहीं, बस करता चला जाता है ,
उसका मौन ही सबसे बड़ा शोर बन जाता है।
मौलिक, स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन




