
जो ख़ुद गिरकर संभल जाते हैं अक़्सर,
वो ज़माने को उठाना सीख जाते हैं।
जिन्होंने झेली हो धूप रास्तों की,
वो औरों पर साया करना सीख जाते हैं।
तजुर्बा ख़ुद का होता है बड़ा उस्ताद,
जो टूटे हों, वो दिल जोड़ना सीख जाते हैं।
जिन्हें मालूम है तकलीफ़ गिरने की,
वो राहों से पत्थर हटाना सीख जाते हैं।
नहीं रहती तमन्ना किसी को गिराने की,
जो ख़ुद संभलकर चलना सीख जाते हैं।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




