साहित्य

जाग अरे

वीणा गुप्त

जाग अरे!

ओ वंशज मनु के!

धमनियों का लहू तेरा ,

जम नहीं गया है।

फड़कता है आवेश अब भी,

तेरी शिराओं में,

थम नहीं गया है।

 

फिर क्यों बैठा जड़ बना यूँ,

काट कर दे फेंक अंग वह,

जो गल गया है।

 

कैसी विडंबना देश में,

नेतृत्व न कोई शेष है।

ललक देशभक्ति की ,

उत्सर्ग की भावना ,

पूर्णतया नि:श्शेष है।

 

बुद्धि पंकिल,

संवेदन रहित उर,

जाल स्वार्थ का कुटिल,

संकीर्ण मानस ने,

तन्त्र को लोक के,

पंगु कर दिया है।

जागृत हो अरे!

वंशज मनु के।

 

 

निर्लज्जता पर जो गर्वित होते,

धिक्कारों से विचलित न होते,

दुर्बलता सीने पर सजाए ,

विजय- भाव से ढोते रहते।

कर पद-प्रहार

इनके मस्तक पर,

देश ऋण अब बढ़ गया है।

जाग्रत हो अरे!

वंशज मनु के।

 

 

अगर चाहता है तू अपना,

प्यारा देश बचाना।

अगर चाहता है तू अपनी,

खोई पहचान बनाना।

तो आस्तीन के साँपों को

पहचान ले।

ढोंगी मक्कारों को

पूरा जान ले।

आग लगाने वाले

कर को तोड़ दे।

विजय पथ पर

हर पराजय मोड़ दे।

तभी देश-रथ

लक्ष्य -पथ पर

बढ़ गया है।

जागृत हो अरे!

वंशज मनु के।

 

 

आंँसू पोंछ ले

हर आंँख का प्यार से।

दूर हो जा,

हर भेदभाव की दीवार से।

प्राणों में जिसकी

संवेदना का गुंजार हो।

वाणी में जिसके

आचरण साकार हो।

बन क्रांतिदूत, तू मन:पूत,

संकल्प तेरा

आस नई भर गया है।

जागृत हो अरे वंशज मनु के,

धमनियों का लहू तेरी ,

जम तो नहीं गया है।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

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