साहित्य

तुम रहती हो मेरे दिल के दर्पण में

कुलदीप सिंह

तुम रहती हो मेरे दिल के दर्पण में एक नई बहार बनकर।

तेरी कजरारी आँखें लगती हैं जैसे सावन की पहली फुहार बनकर।

 

भौंहें तेरी धनुष सी तन जातीं मन पर प्रेम का तीर चला जाती हैं।

माथे की बिंदिया चाँद बनकर हर रात को उजियारा दे जाती है।

 

गालों की लाली गुलाबों से हर मौसम को महका देती है।

होंठों की मधुर मुस्कान तेरी अमृत की धारा बहा देती है।

 

दाँत चमकें जैसे मोती बिखरे सागर की गहराई में कहीं।

तेरी हँसी की मीठी सरगम खो जाने को कहती है यहीं।

 

केश तेरे काली घटाओं जैसे मन पर प्रेम बरसा जाते हैं।

तेरी चाल मृगनयनी सी लगती सबके दिल धड़काते हैं।

 

तेरी वाणी कोयल की बोली हर पीड़ा को हर लेती है।

तेरा सादा-सा मनमोहक रूप हर धड़कन में बस लेती है।

 

तू धरती पर उतरी अप्सरा ईश्वर की अनुपम रचना है।

तेरे सौंदर्य के आगे फीका हर फूल और हर सपना है।

 

बस इतनी-सी मेरी आरज़ू हर जन्म तेरा ही संग मिले।

तू रहती रह मेरे दिल के दर्पण में और मेरा हर गीत तुझ पर !

 

 

 

कुलदीप सिंह रुहेला

सहारनपुर उत्तर प्रदेश में

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