साहित्य

यमराज मित्र से आत्मीय मुलाकात

डॉ॰ शिवकुमार

साहित्य की दुनिया में अनेक रचनाकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, किंतु कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो पहली ही भेंट में अपने आत्मीय व्यवहार और सहज मानवीय गुणों के कारण हृदय में स्थायी स्थान बना लेते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं सुप्रसिद्ध हास्य-व्यंग्यकार सुधीर श्रीवास्तव ‘यमराज मित्र’।

 

उनसे मेरी पहली भेंट रायबरेली काव्य रस साहित्य मंच के एक साहित्यिक आयोजन में हुई। परिचय का वह क्षण आज भी स्मृतियों में ताज़ा है। पहली मुलाकात में ही ऐसा लगा मानो वर्षों पुराना परिचय हो। औपचारिकता का कोई आवरण नहीं था; आत्मीयता सहज ही दोनों ओर प्रवाहित होने लगी। समय के साथ यह परिचय स्नेह और विश्वास के ऐसे संबंध में परिवर्तित हो गया, जिसकी ऊष्मा आज भी मन को स्पर्श करती है।

 

कुछ समय बाद गोरखपुर और देवरिया की साहित्यिक यात्रा के दौरान उनके निवास पर रात्रि-विश्राम का अवसर मिला। उनके परिवार ने जिस अपनत्व, स्नेह और सम्मान के साथ हमारा स्वागत किया, उसने मन को गहराई तक छू लिया। ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि हम अतिथि हैं; ऐसा लगा जैसे अपने ही परिवार के बीच बैठे हों। भारतीय संस्कृति की ‘अतिथि देवो भवः’ की भावना को मैंने वहाँ केवल देखा ही नहीं, बल्कि आत्मसात भी किया। वह आत्मीय आतिथ्य आज भी मेरी अमूल्य स्मृतियों का हिस्सा है।

 

सुधीर जी का व्यक्तित्व जितना सरल है, उनकी लेखनी उतनी ही प्रभावशाली। उन्होंने ‘यमराज’ जैसे गंभीर पौराणिक पात्र को अपना काल्पनिक मित्र बनाकर जिस मौलिक शैली में हास्य-व्यंग्य की रचना की है, वह हिंदी साहित्य में उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाती है। उनकी रचनाओं में हास्य केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि सामाजिक विसंगतियों पर तीखा किंतु मर्यादित प्रहार भी करता है। पाठक मुस्कुराते हुए आत्ममंथन करने को विवश हो जाता है।

 

साहित्य पर उनसे होने वाली प्रत्येक चर्चा में उनकी यह मान्यता स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती रही कि लेखक का दायित्व केवल शब्दों का विन्यास करना नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशीलता, नैतिकता और सकारात्मक चेतना का संचार करना भी है। यही कारण है कि उनकी कविताओं, दोहों और लघुकथाओं में जीवनानुभव, सामाजिक सरोकार और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

 

आज जबकि साहित्य में आत्मीयता और मानवीय संवेदनाएँ कहीं-कहीं क्षीण होती प्रतीत होती हैं, ऐसे समय में सुधीर श्रीवास्तव ‘यमराज मित्र’ जैसे रचनाकार आश्वस्त करते हैं कि साहित्य अभी भी मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की शक्ति रखता है। उनकी सरलता, विनम्रता, आत्मीयता और सृजनशीलता की यह मधुर स्मृति मेरे लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

कविराज डॉ॰ शिवकुमार सिंह ‘शिव’

दुसौंती, रायबरेली (उ.प्र.) – 229306

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