
प्राची में झाँके रवि सद्यः भोर ,
लालिमा हँसकर फैली चहुँ ओर ।
हिमगिरि पर पेड़ों के झुरमुट में,
गाती चिड़ियां टी वी टी टुट टुट में ।
रश्मियाँ प्रकीर्णित हो बाहें फैलाएँ,
प्रकाश पुंज से दीप्त दसों दिशाएं ।
सुगंधित मलय पवन मंद बह चली,
कुसुमित प्रसून मुदित कली-कली ।
झर रहा मकरंद झलका तुषार,
पवन हिलाता डाली बार -बार ।
तुहिन बिंदु झरते ज्यों मुक्ताहार ,
सतरंगी चुनरिया ओढ़े बहार ।
चीड़ देवदार खड़े आमलताश,
केलि करें जलमुर्गी बांधे पाश ।
पेड़ों और पत्तों पर ओस घनेरे,
उठो काम पर चलो नित्य सबेरे ।
सरोज शर्मा
दिल्ली




