साहित्य

भोर का प्राकृतिक सौंदर्य

सरोज शर्मा

प्राची  में  झाँके   रवि  सद्यः  भोर ,

लालिमा  हँसकर  फैली  चहुँ ओर ।

हिमगिरि पर  पेड़ों  के  झुरमुट में,

गाती  चिड़ियां टी वी टी टुट टुट  में ।

 

रश्मियाँ प्रकीर्णित हो बाहें फैलाएँ,

प्रकाश पुंज से दीप्त दसों  दिशाएं ।

सुगंधित मलय पवन मंद बह चली,

कुसुमित प्रसून मुदित कली-कली ।

 

झर  रहा  मकरंद  झलका  तुषार,

पवन  हिलाता  डाली   बार -बार ।

तुहिन बिंदु  झरते  ज्यों मुक्ताहार ,

सतरंगी    चुनरिया   ओढ़े  बहार ।

 

चीड़   देवदार  खड़े  आमलताश,

केलि  करें  जलमुर्गी  बांधे  पाश ।

पेड़ों  और  पत्तों  पर ओस घनेरे,

उठो  काम पर चलो  नित्य सबेरे ।

 

सरोज शर्मा

दिल्ली

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