साहित्य

आवारा बादल

ममता झा मेधा 

 

आसमाँ का आवारा हूँ मैं, कोई ठौर-ठिकाना नहीं,

पवन के संग बहता जाऊँ, कोई बंधन पुराना नहीं।

कभी पूरब तो कभी पश्चिम, मर्जी मेरी, मौज मेरी,

धरती से जब नज़र मिलाऊँ, बरस पड़े ये नैन मेरी॥

 

कभी सजूँ मैं काजल बनकर, सावन की पहली आस में,

कभी गरज कर डराऊँ जग को, बिजली की तलवार पास में।

कभी रुई-सा हल्का-फुल्का, धूप से करूँ लुका-छिपी,

कभी घुमड़ कर ऐसा छाऊँ, लगे रात दिन में अभी॥

 

ना खेत मेरा ना खलिहान, ना कोई मेरी सरहद है,

जिस आँगन बरस जाऊँ मैं, वही मेरा घर, वही हद है।

प्यासे खेतों का मैं साथी, तपते माथे का चंदन हूँ,

बिछड़े प्रेमी की आँखों का, मैं ही तो बरसता क्रंदन हूँ॥

 

मत बाँधो मुझको नक्शों में, मैं आज़ाद परिंदा हूँ,

रूप बदलता हर पल मेरा, मैं कुदरत का ज़िंदा हूँ।

जब मन चाहे बरस जाऊँ, जब चाहे उड़ जाऊँ दूर,

आवारा हूँ पर बेदर्द नहीं, मैं जीवन का सुर हूँ, नूर॥

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  • ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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