साहित्य

श्रम और संघर्ष गीत

डॉ मंजु गुप्ता

साधा हमने कर्म लक्ष्य तो, श्रम और संघर्ष करना है।

पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है ।।

जीवन की भट्टी में नित ही ,सूरज जैसे नर को तपना ।

लापरवाही हमने की तो,होगा अब पूर्ण नहीं सपना ।।

हमको आलस के दलदल से , तब बाहर मित्र निकलना है।

पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।।

 

सीमा पर सैनिक को देखो,मौसम की मारों को सहता।

करता प्राण त्याग माँ हित में,निर्भय हो जय वंदे कहता।।

आँधी -लू मग पर सहकर ही , हम सब को आगे बढ़ना है।

पथरीले कंटक पथ साथी,तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।।

 

नदिया भी लक्ष्य लिये चलती,जाकर सागर में मिल जाती ।

सारी बाधाओं को सहती, फिर भी गीत मिलन के गाती।।

 

दृग से धार खुशी की फूटे , खुद उत्सर्ग हमें करना है।

पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।

 

डॉ मंजु गुप्ता

वाशी , नवी मुंबई।

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