
अंबर से बरसे जब पानी,
थाम ले सबकी यह परेशानी।
खुशियों की जो बारिश थी आई,
अब वह बन गई है तबाही।
सड़कों पर पानी है भरा,
हर घर में यह कैसा डर है डरा?
नालों में अब बाढ़ सी आई,
हर एक गली है जलमलाई।
बिजली भी है अब तो भागी,
दौड़ें गाड़ियां या पैदल भागीं?
छत टपके और कांपे दीवारें,
बच्चे डर कर देखें अंधियारे।
प्रकृति का यह कैसा है रूप?
छिपी घटाओं में धूप-छांव की धूप।
हम तो केवल यही दुआ करते,
रुक जाएं अब यह बादल बरसते।
जब बारिश हुई मूसलाधार,
जनजीवन हो गया बेहाल,
गड्ढों नालो में हुआ जल भराव,
सड़को पर पानी का ठहराव।
रुक गया यातायात, मजबूर हुए
लोग चलने को पैदल,
नही दिख रहा फुटपाथ।
स्वरचित मौलिक रचना
संगीता वर्मा, कानपुर उत्तर प्रदेश




