
माँ सरस्वती बनो सहायक
रखता कोई ज्ञान नहीं मैं,
लिखूँ नहीं मैं कोई कविता।
माँ सरस्वती बनो सहायक,
लिखवादो जो मनको रुचिता।
व्याकरण भी मेरा अधूरा,
ज्ञान नहीं कोई भी पूरा।
मन की बात करूँ मैं कैसे,
लिखता कविता जैसे-तैसे।
लिखने में मैं ध्यान लगाऊँ,
छंद सीख कर ज्ञान बढ़ाऊँ।
मात्रा गणना भूल गया हूँ,
कविता कैसे मैं लिख पाऊँ।
समझाते हारे हैं कवि जन
लिख गाओ सब अपने मन
लिखना पहले मन की बातें,
कविता लिखते बीती रातें।
मन में आये जो भी विचार,
लिखते गीत मैं करूँ सुधार
मैं कोई कवि नहीं हूँ यार्,
लिख गाते हम कविता चार।
डॉ जगदीशनारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️



