
जाने कहाँ है वो छतरी हमारी
जो बारिश की थी पहली चाह प्यारी
फकत तुम हो मैं हूँ मेरे भींगे अरमां
अजब दुविधा है जल रही भींग सारी।
गुज़रे हुए कितनी सदियों के छीने
लिखे उँगलियों पर हैं दिन वो महीने।
मजबूरियों का बुना ताना बाना,
कभी पीछे मुड़ कर न देखा न माना
वो छप्पर के छाजन मे थी गुड़िया हमारी।
नहीं दिखते अब वो सप्तर्षि जागे,
सज जाते गगन में सबसे पहले आके।
हमें दिखते मद्धम फिर सभी तारे,
बस एक चमकता साँझ सकारे,
लगती चमक जा ए किस्मत हमारी।
नहीं कुछ रहा ढूढता मन दीवाना.
मगर याद कर लेता बचपन सुहाना
रहा कशमकश कुछ खोना या पाना
है किसके पीछे दुखी मन न जाना।
मगर ढूंढ़ लेगी है कोशिश हमारी.
ए मन आज भी भीगता सा लगे है
किसी बीते पल में छुपा सा चले है.
बस याद कर एक मंजर सुहाना
जिस ताल में खेलता था दिवाना
उसी ताल में फिर है कश्ती हमारी ।
संगीता श्रीवास्तव शिवपुरी




