
जो मिटा दे हर अहम
वो मोड़ लाता है ये प्रेम,
मौत को भी ज़िंदगी का
रूप देता है ये प्रेम।
ढूँढते हैं लोग जिसको मंदिरों-मस्जिद में यूँ,
कण-कण में साँस बनकर मुस्कुराता है ये प्रेम।
जीत सकती है न कोई भी यहाँ नफ़रत की फ़ौज,
तीर ख़ंजर के बिना ही
जग को जीतता है ये प्रेम।
शून्य कर देता है जो भी इसके साए में गया,
फ़िर उसे ही हर तरफ़
ब्रह्मांड दिखता है ये प्रेम।
इब्तिदा भी प्रेम है और इन्तिहा भी प्रेम है,
है अग़र ईश्वर कहीं,
तो बस यही है, है ये प्रेम।
-डॉ. दक्षाजोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




