
फटी बिसाती सर्द हवाएँ फुटपाथ कोना,
ज़िन्दगी को बिना बिछौने रोज़ ही सोना।
महल मत कहो ईंटों के इस ढाँचे को,
सुलगती साँसों का यहाँ बस पाना खोना।
कोई किसी का नाम ज़ात नहीं टटोलता,
भूख का रंग यहाँ सबको एक पिरोता।
अजीब तमाशा मुंसिफ़ की इस का़यनात का,
आसमाँ अपना छत का टुकड़ा खिलौना होता।
पोटली में बँधा उजड़ा हुआ वो गाँव,
छालों में छुपा मीलों का सफ़र ,
सुबह जब उठ जाएँगे मुसाफ़िर,
शहर की रूह में सन्नाटा ही बोना।
तरक्की का सुबूत है रैन बसेरा होना?
या हमारी संवेदनशीलता का ही यह रोना?
जो छत देती सिर्फ़ रात भर मोहलत,
उससे मुक़म्मल आसमाँ पाना महज़ एक टोना।
सुबह की किरण फ़िर अजनबी बना देगी।
ज़िन्दगी को सड़क पर ख़ुद को ढोना।
रैन बसेरा बस चंद घंटों का उधार।
बाक़ी हर मोड़ तन्हाई का ही बिछौना।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




