साहित्य

पिता और पुत्र का संवाद-काव्य

दिनेश पाल सिंह

 

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पिता नहीं हैं, तो मैं क्या हार जाऊँगी,

तेरे हर सपने को मैं सँवार जाऊँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो तुझे पढ़ाऊँगी,

ज्ञान का दीप तेरे मन में जलाऊँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो तुझे बढ़ाऊँगी,

हर कठिन राह में साथ निभाऊँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो संस्कार दूँगी,

सत्य का पथ तुझे अपनवाऊँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो साहित्य पढ़ाऊँगी,

शब्दों का सच्चा मान सिखाऊँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो हिम्मत भर दूँगी,

तेरे मन से हर भय दूर कर दूँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो रिश्ते सिखाऊँगी,

अपने-पराए का भेद बताऊँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो दुनिया दिखलाऊँगी,

जीवन का हर रंग समझाऊँगी।

 

पिता नहीं हैं, तो माँ भी मैं, पिता भी मैं,

जीवन भर अपना धर्म निभाऊँगी।

 

पिता का स्वर

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मैं पिता हूँ, तो तुझे झुकने न दूँगा,

सत्य के पथ से कभी हटने न दूँगा।

 

मैं पिता हूँ, तो तुझे पढ़ाऊँगा,

ज्ञान से जीवन तेरा सजाऊँगा।

 

मैं पिता हूँ, तो चरित्र गढ़ूँगा,

ईमान का दीप सदा ही धरूँगा।

 

मैं पिता हूँ, तो साहस दूँगा,

हर संघर्ष में विश्वास दूँगा।

 

यदि चिकित्सक बने, सेवा करना,

पीड़ित जन का दुःख भी हरना।

 

यदि अभियंता बने, यह याद रहे,

देश का गौरव सबसे बड़ा रहे।

 

यदि कवि बने, तो सत्य लिखना,

मानवता का दीपक बनना।

 

धन से पहले सम्मान कमाना,

हर रिश्ते का मान निभाना।

 

मैं न रहूँ, तब भी मत डरना,

मेरे संस्कारों संग ही बढ़ना।l

 

पुत्र का स्वर

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माँ, तेरे आँचल की छाया याद आती है,

हर मुश्किल में तेरी दुआ साथ आती है।

 

पिता, तेरी चुप्पी अब बोल रही है,

हर सीख मेरी राहें खोल रही है।

 

तुमने जो बोया, वही मैं काट रहा हूँ,

अपने जीवन का अर्थ आज बाँट रहा हूँ।

 

माँ, तेरे त्याग का ऋणी रहूँगा,

हर जन्म तेरा ही पुत्र कहूँगा।

 

पिता, तेरे श्रम का मान रखूँगा,

सत्य के पथ पर जीवन रखूँगा।

 

तुम दोनों मेरे प्रथम गुरु हो,

मेरे हर सुख-दुःख के सुर हो।

 

जो कुछ पाया, तुमसे पाया,

जीवन का हर दीप तुमने जलाया।

 

अब मेरा भी एक ही प्रण है—

तुम्हारे आदर्शों का ही जीवन है।

 

जहाँ कहीं भी तुम दोनों हो,

मेरा शत-शत नमन स्वीकार करो।

 

माँ ममता है, पिता विश्वास,

दोनों से ही जीवन का प्रकाश।

 

उनके चरणों की धूल ही धन है,

उनका आशीष ही मेरा जीवन है।

 

कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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