साहित्य

प्रयागराज दि ग्राम टूडे

जयचन्द प्रजापति

यागराज की मिट्टी में पले-बढ़े जयचन्द प्रजापति ‘जय’ आज के दौर के उन विरले रचनाकारों में हैं जो कविता को सिर्फ “स्टेटस” नहीं, “स्टेटमेंट” मानते हैं। इनकी कलम में न तो निठल्ले कवियों वाली सजावट है, न ही दरबारी साहित्यकारों वाला दंभ। ये आवारा हैं – पर विचारों से। त्यागी हैं – पर कलम के प्रति। इनका साहित्य समुद्र की तरह गहरा है, मगर खारा नहीं।

 

जय जी की कविता का कैनवास बहुत चौड़ा है। एक तरफ ‘निष्ठुर समय’ में भरी दुपहरी में भीख मांगती युवती का दर्द है, तो दूसरी तरफ ‘किशोर की ललकार’ में सत्ता के चाबुक पर तनकर खड़ा 15 साल का लड़का है। ‘उनका हिस्सा’ में सड़क पर रात गुजारने वाले का हक मांगते हैं, तो ‘हे नवांकुरों’ में नए लिखने वालों को आसमां दिखाते हैं। ‘नेताजी की सेवा’ में चुनावी तंत्र की धज्जियां उड़ाते हैं।

इनकी नजर सिर्फ गरीबी पर नहीं, गरीबी पैदा करने वाले सिस्टम पर है। ये आंसू दिखाते हैं, पर आंसू पोछने वाली मुट्ठी भी दिखाते हैं।

 

जय जी की सबसे बड़ी खूबी है – “कम में बहुत कुछ कह देना”। 12-15 लाइन की कविताओं में पूरा समाजशास्त्र रख देते हैं। ‘निष्ठुर समय’ की “ग्राहक की ओर बढ़ जाती” या ‘उनका हिस्सा’ की “रसूखदारों का मजमा लगा है” – ये एक-एक शब्द व्यंग्य का तीर है।

 

इनकी भाषा सरल है, सादी है, पर चुभती है। ये ‘कटु शब्दों का आह्वान’ नहीं करते, बल्कि सच इतने सहज ढंग से रखते हैं कि वही सबसे बड़ा प्रहार बन जाता है। अलंकारों का बोझ नहीं, अनुभव का वजन है।

 

जय जी सिर्फ कविता नहीं लिखते, कवि का आचरण भी लिखते हैं। अपने लेख ‘सच्चा साहित्यकार कैसे बनें’ में इन्होंने खुद के लिए लक्ष्मण-रेखा खींची है – त्याग, सरलता, सहानुभूति, आचरणहीनता से दूरी, और दंभ का त्याग।

 

इनकी रचनाएं उसी कसौटी पर खरी उतरती हैं। ‘हे नवांकुरों’ में ये गुरु बनकर हौसला देते हैं, ‘किशोर की ललकार’ में अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं। इनके यहां साहित्यकार “पक्षगिरी नहीं करता” बल्कि “सत्य की पथ पर” चलता है।

 

*4. तीन स्तंभ: करुणा, क्रोध और उम्मीद*

इनके काव्य के तीन स्तंभ हैं:

 

– *करुणा:* ‘निष्ठुर समय’ की युवती, ‘उनका हिस्सा’ के बेघर – इनके लिए कलम रोती है।

– *क्रोध:* ‘किशोर की ललकार’ और ‘नेताजी की सेवा’ – यहां कलम आग उगलती है।

– *उम्मीद:* ‘हे नवांकुरों’ – यहां कलम दीपक बन जाती है। रास्ता दिखाती है।

 

यही संतुलन इन्हें “निठल्ले कवि” से अलग करता है। ये सिर्फ समस्या नहीं दिखाते, समाधान की जिद भी दिखाते हैं।

 

जयचन्द प्रजापति ‘जय’ की कविता दरअसल एक आवारगी है – सत्ता की गलियों में, समाज की बस्तियों में, सिस्टम के दफ्तरों में। पर ये आवारगी बेलगाम नहीं है। इसका एक पक्का इरादा है – कमजोर को आवाज देना, ताकतवर से सवाल पूछना, और नए लिखने वालों को रास्ता दिखाना।

 

इनकी कलम बताती है कि सच्चा साहित्यकार AC कमरे में नहीं जन्मता। वो दुपहरी में भीख मांगती मां की आंख में जन्मता है, मां के अपमान पर तनकर खड़े किशोर की मुट्ठी में जन्मता है।

 

तुलसी ने कहा था – “कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सब कर हित होई”। जय जी की कविता उसी सुरसरि की एक धारा है – सबका हित करने वाली, पर गंदगी को बहा ले जाने वाली।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!