
चंदा आया धर्म के नाम जेबों में जाकर सो गया
सेवा का जो दीप जला था नोटों संग ही खो गया।
रसीदों में सपने लिखे थे भाषण में था बड़ा उजाला
हिसाब माँगा तो बोले सब मत खोलो अब ये ताला।
मंच सजाया ढोल बजाया खूब लगाई जय-जयकार
पीछे बैठा चंदा चोर गिनता अपना कारोबार।
कहते हैं जनसेवा होगी,बदल देंगे गाँवनगर
पहले अपनी तिजोरी भर ली फिर बोले अब आएँगे घर।
झंडे ऊँचे बातें ऊँची नीयत निकली कितनी छोटी
जनता समझी फूल बरसेंगे बरसी केवल झूठ की रोटी।
दानदाता सोच रहा है कहाँ गया मेरा उपहार
उत्तर आया मुस्काकर हो गया विकास इस बार!
ईमानदारी रोती बैठी शर्म खड़ी सिर झुकाए
चंदा चोरों के किस्से सुनकर सच भी आँसू बहाए।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश



