
लेखनी पुकारे आओ , मन भाव में समाओ
शब्द फूल बरसाओ, महिमा महान जी।
मिली कृपा सदा प्यारी, लीला लगे अति न्यारी।
गाथा लिखती तुम्हारी, करुणा निधान जी।।
नहीं छंद ज्ञान सारा, देना मुझको सहारा,
बहे छंद ज्ञान धारा , सुनो भगवान जी।
आयी तेरे द्वारे दासी , तेरे दर्श की मैं प्यासी,
सुनो अर्ज अविनाशी, तुम्हीं दयावान जी।।
करुणा सागर भोले , बंद चक्षु मेरे खोले,
मन जय-जय बोले, चरणों में माथ है।
तू है जग हितकारी, हो तुम मंगलकारी,
तुम्हीं अमंगलहारी , मिले तेरा साथ है।।
शरण तुम्हारी आई, बेलपत्र-फल लाई,
तेरी छवि मन छाई , आप मेरे नाथ है।
शब्द करें तेरी पूजा,तेरे जैसा नहीं दूजा।
महाकाव्य रच सकूँ, रहे तेरा हाथ है।।
बिगड़े न काम मेरा ,मिले आशीर्वाद तेरा ,
कृति में है प्रभु डेरा , प्रेम मेरा लीजिए।
प्रीत तेरी मुझे चढ़ी,पलकें बिछाए खड़ी,
चुनौतियों से मैं लड़ी , शुभ फल दीजिए।।
अगम-सुगम बने , कृति में है छंद सने,
राग रंग सब तने , रस अमृत पीजिए।
द्वेष छल सब हरा ,दिल मैंने शुद्ध करा,
भीत से है मन भरा, इसे नाश कीजए।।
हाथ जोड़ूँ महाकाल , तुम्हीं कालों का हो काल ,
भाव भरे फूल थाल,चढ़ाऊँ निधान जी।
तुम्हीं अर्धनारीश्वर , ओजसतेजोद्युतिधर ,
मन द्वार चंद्रेश्वर , खोलना सुजान जी।।
नष्ट करो बुरे भाव , स्वच्छ साफ हो स्वभाव,
पड़े आपका प्रभाव , हे रुद्र ईशान जी।
जटाधर शशिधर , हरिशर हर-हर,
देना मुझे आप वर , हे सर्व प्रधान जी।।
डॉमंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई



