
लड़के रोते हुए अच्छे नहीं लगते।
पुरुष हो अथवा महिला में एक मात्र लिंगभेद को छोड़ दिया जाय तो दोनों की शारिरिक बनावट में कोई अंतर नहीं। दोनों के ही दो हाथ, दो पैर, दो आँख, दो कान, एक नाक, एक सिर, सिर में एक मस्तिष्क होता है।
भारतीय परिवेश में चाहे वह उत्तर हो या दक्षिण, धनी हो अथवा निर्धन हर परिवार में, गाँवों तथा शहर दोनों जगहों में लड़कों तथा लड़कियों के पालन पोषण के तरीके में बहुत भिन्नता हुआ करती थी। लड़के का पालन पोषण लड़की की तुलना में अधिक अच्छे तरीके से होता था। उसे खाने को अच्छा व पौष्टिक आहार दिया जाता था, पढाई के अवसर भी लड़कों को अधिक मिलते थे।
इसका कारण थी वह रूढ़िवादी परम्परा, जिसके आधार पर यह माना जाता था कि आगे चलकर पुरुष को परिवार का लालन पालन करना है। इसी वजह से लड़के को कुछ इस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता था कि वह कमजोर न पढ़ने पाये। इसीलिए रोने की दशा में उसे उलाहना दी जाती थी कि “क्या लड़कियों की तरह रोते हो” और वहीं कहीं अगर कोई लड़की जोर से हँस देती थी तो कहा जाता था “क्या राक्षसों की तरह हँस रही हो”।
रोना एक भावना के स्वरूप होता है। जिसका मन मजबूत होता है वह छोटी मोटी बातों में रोता नहीं। वहीं कुछ व्यक्ति (चाहे पुरुष हो या महिला) अधिक भावुक होते हैं। बहुत छोटी छोटी बातों में भावुकतावश रो पड़ते हैं। आप सभी ने देखा होगा कि रामायण के कुछ प्रसंग पढ़ते हुए कुछ इतना भावुक हो जाते हैं कि उनके आँसू रुकते ही नहीं व गला भी रुँध जाता है। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता। यही स्थिति फिल्मों को देखते हुए भी होती है।
आज स्थिति भिन्न है। लड़कियों को बराबरी के अवसर मिल रहे हैं। वे पढ़ लिखकर अच्छे पदों पर हैं और उनमें आत्मविश्वास की कमी भी नहीं। इसीलिए आपने गौर किया होगा कि सब विवाह में लड़कियों को रोते हुए भी कम देखा जाता है। मेरी व्यक्तिगत राय तो यह है कि लड़कियों अथवा महिलाओं में आत्म बल पुरुषों से अधिक होता है।
अंत में कहूँगा कि रोना एक भावनाप्रधान घटना है अतः लड़की अथवा लड़का दोनों ही इससे समान रूप से प्रभावित होते हैं।
सुरेशचन्द्र जोशी, उत्तराखंड, पिथौरागढ़।




