साहित्य

अपेक्षा की भीड़ में

डाॅ सुमन

अति भरोसा जब बढ़े, टूटे मन के तार।

अपेक्षा की भीड़ में, खो जाए व्यवहार।

 

ज़रूरत की घड़ी में, जब अपने मुड़ जाएँ,

मौन बने रिश्ते सभी, गहरे घाव दे जाएँ।

 

स्वार्थों के इस दौर ने, बदले कितने रूप,

छल की कड़वी धूप में, झुलसे मन के कूप।

 

जिनको समझा साथी हम, वे ही बने प्रहार,

विश्वासों के शीश पर, कर गए आघात।

 

सीखा जीवन ने मगर, कड़वा यह उपदेश,

आत्मबल ही साथ है, शेष सभी परिवेश।

 

अति भरोसा छोड़कर, विवेक को अपनाओ,

अपने श्रम के दीप से, जीवन-पथ चमकाओ।

 

अपेक्षा कम कीजिए, सेवा का हो भाव,

निस्वार्थ कर्मों से मिले, हर मन को सद्भाव।

 

आघातों की आग में, जो तपकर निखर जाए,

वही मनुष्य विपत्ति में, अपना पथ बन पाए।

 

गिरकर फिर उठना सीख, साहस को दो साथ,

संघर्षों की जीत ही, मिटा सके आघात।

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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