साहित्य

आखिरी यात्रा 

डॉ. प्रभा जैन

बादलों में बिना टिकट,मैं कैसी यात्रा पर हूँ,उडी जा रही हूँ,उडी जा रही हूँ।

 

खो गयी हूँ बादलों में, पुकार रहा है नाम कोई, सुन रही हूँ,हिल नहीं पा रही हूँ।

 

देख रही हूँ,की जिनकी मन-तन-धन से सेवा, आँसू पोछ रहे है।

 

रख स्वाभिमान जिंदगी जी,दया-त्याग-क्षमा भावना संग।

 

नहीं किया किसी को परेशान,जिसका बहुत अच्छा किया सम्मान, बहुत कष्ट उनसे मिला।

 

सूर्य वैसे ही उगेगा और ढलेगा, चाँद तारे चमकेगे, शीतल पवनबहेगी,महसूस करने वाली मैं ना देख सकेगी।

 

चाहती हूँ आखरी यात्रा से पहले अपने नेत्र और देह दान कर जाऊं।

 

चाहती हूँ चिड़ियाँ की तरह चहकना-उड़ना, खुशी-खुशी निस्वार्थ सेवा।

 

नहीं चाहिये आखरी यात्रा पर अंतिम संस्कार जैसी हूँ वैसे ही विद्युत शव गृह ले जा लीजिये।

 

नहीं चाहती कोई पेड कटे,

मेरे साथ उस लकड़ी की भी हो आखरी यात्रा।

 

सुन रही हूँ, कोई अपना कह रहा है जल्दी करो….,

लाश को ले चलो,नाम छूट गया।

 

मुझे अपना नाम बहुत पसंद है मेरे पिताजी द्वारा दिया गया,आज लाश कह,पुकारा जा रहा है।

 

कृपया शुभकामनायें दे दीजिये,काया रूपी वस्त्र बदल कर नवजीवन लेने जा रही हूँ मैं।

 

सभी बड़ों-छोटों से आशीर्वाद चाहती हूँ,मेरी हर गलती को क्षमा कर दीजिये।

 

ॐ शान्ति-शान्ति-शान्ति ॐ, नमन कर,आपसे विदा ले रही हूँ मैं।

 

डॉ. प्रभा जैन “श्री ”

देहरादून

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