
सावन की फुहारें बरसते ही संपूर्ण सृष्टि शिवमय हो जाती है। बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर जाने वाली सड़कें और तंग गलियाँ अब केवल मार्ग नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग बन जाती हैं। चारों ओर गूँजता ‘बोल बम’ का जयघोष वातावरण को दिव्य ऊर्जा से भर देता है। यह वह अद्भुत पड़ाव है, जहाँ न कोई ऊँच-नीच है, न जाति-पाति का भेद, और न ही अमीर-गरीब का फासला; यहाँ केवल शिव’ हैं और उनके प्रति अटूट आस्था।
सुईया पहाड़ भक्ति की कसौटी…….
सुल्तानगंज और देवघर के मध्य स्थित
‘सुईया पहाड़’
इस कांवड़ यात्रा का सबसे कठिन और महत्वपूर्ण पड़ाव है। लोक-मान्यता है कि सुईया पहाड़ की कठिन चढ़ाई और इसके कंकर-पत्थरों की तीखी चुभन साक्षात भक्त की परीक्षा लेती है। भक्त जब नंगे पांव इन कटीले रास्तों से गुजरते हैं, तो उनके पैरों में पड़े छाले वेदना नहीं, बल्कि बाबा के प्रति समर्पण का प्रमाण बन जाते हैं।
कहावत है—
“जिसने सुईया पहाड़ पार कर लिया, उसने समझो शिव शंभू की परीक्षा पास कर ली।”
भक्त अपने शरीर की पीड़ा को भुलाकर, एक-एक पग पर शिव स्तुति करते हुए आगे बढ़ते हैं। तन पर गेरुआ वस्त्र, माथे पर त्रिपुंड और कंधे पर कांवड़ में झूलता गंगाजल—यह दृश्य स्वयं में एक तपस्या है।
शिवत्व का साक्षात् अनुभव………
भोले बाबा जगत के पिता तो हैं ही, लेकिन अपने भक्तों के लिए वे एक अति संवेदनशील पिता भी हैं। वे अदृश्य रूप से अपने हर कांवड़िये के साथ चलते हैं, उनके पैरों की थकान को अपनी शक्ति से दूर करते हैं और अंततः स्वयं को अभिषेक के लिए समर्पित करते हैं।
मुझे आज भी वह यात्रा याद है, जब सुल्तानगंज से संकल्पित गंगाजल उठाकर हम बाबा बैद्यनाथ की ओर चल पड़े थे। चार दिनों की वह पदयात्रा, वे नदियाँ, वे दुर्गम मार्ग और अनगिनत यादें आज भी हृदय में अंकित हैं। उस यात्रा में नपा-तुला आहार, संयमित जीवन और मन में बस एक ही धुन थी—
‘बाबा के चरणों तक पहुँचना है।’
अमिट दूरी और अटूट संकल्प……….
यद्यपि आज आधुनिक सरकार ने व्यवस्थाओं को अति उत्तम कर दिया है। पहाड़ों के बीच सुगम सड़कों का निर्माण हो गया है और ऊबड़-खाबड़ रास्तों को सुलभ बना दिया गया है, किंतु सुल्तानगंज से देवघर की लगभग 105-110 किलोमीटर की दूरी को कोई भी भौतिक शक्ति कम नहीं कर सकती। यह दूरी स्वयं महादेव द्वारा निर्धारित की गई है, ताकि भक्त अपनी श्रद्धा की परीक्षा दे सके। एक सामान्य मनुष्य का अपनी शारीरिक सीमाओं से परे जाकर इस यात्रा को पूरा कर लेना, बाबा की असीम कृपा और उदारता का ही परिणाम है।
सावन को शिव का महीना कहा जाता है, किंतु सत्य तो यह है कि आस्था और भक्ति न किसी समय की मोहताज होती है और न ही किसी कैलेंडर की। भक्ति तो भक्त के हृदय के स्पंदन से तय होती है। जो हृदय शिव की लगन में डूबा हो, उसके लिए हर मार्ग सरल और हर क्षण सावन है।
“भक्त की शक्ति बाबा वैधनाथ की भक्ति का मिलन ही कांवड़ यात्रा का असली चित्रण है। ”
अभिलाष श्रीवास्तव, गोरखपुर




