साहित्य

लघुकथा- छतरी 

डॉ ऋतु अग्रवाल 

अब इस बारिश को भी अभी आना था!” मीनल ने अपनी सहयोगी दीपा से कहा।

“यार! लेट हो जाएँगे तो बॉस बहुत सुनाएगा। छुट्टी लग जाएगी और पैसे कटेंगे अलग।” दीपा ने गुस्से से कहा।

मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़े तमाम लोगों का लगभग यही हाल था। किसी को ऑफिस तो किसी को दुकान पहुँचना था पर बारिश रुक नहीं रही थी।

“मैडम जी। छाता ले लो।” एक चौदह-पंद्रह साल का लड़का गेट पर छतरियाँ बेच रहा था।

“कितने की है?” दीपा ने पूछा।

“डेढ़ सौ रुपए की।” छतरी बेचने वाला लड़का बोला।

“तीन छतरियाँ दे दो। यह लो ₹500।” दीपा ने 500 का नोट देते हुए कहा।

“अरे! तीन क्यों ले रही है? हम तो दो ही हैं।” मीनल बोली।

“एक इस छतरी वाले भाई के लिए।” कह कर दीपा ने एक छतरी खोलकर छतरी बेचने वाले लड़के के हाथ में पकड़ा दी।

स्वरचित

डॉ ऋतु अग्रवाल

मेरठ, उत्तरप्रदेश

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