साहित्य

खुद को जानो

सौ, भावना

आज अकेले यूं ही बैठे-बैठे,

दिल ने किया एक सवाल।

कौन हूं मैं क्या वजूद मेरा?

क्यों दिल में रहता मलाल।

 

भीड़ में कहीं खो गई मैं,

खुद की पता नहीं पहचान।

दुनिया को तो समझ गई हूं,

खुद को कैसे पाऊंगी जान।

 

आईने में खुद को देखकर,

अपनी पहचान ढूंढती हूं।

आत्मा की गहराई में उतर कर,

अपना स्वाभिमान खोजती हूं।

 

दुनिया की राह पर क्यों चलूं?

मेरी अपनी मंजिल कहां है।

भीतर जाकर खुद को पा जाऊं,

ऐसा मेरा विश्वास कहां है?

 

खुद से दोस्ती करके अब मैं,

भीतर की यात्रा करना चाहती हूं।

आत्मा की गहराइयों में उतर कर,

खुद को बस पाना चाहती हूं ।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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