साहित्य

तोड़ कर पिंजड़ा उड़ जायेंगे

संगीता वर्मा

का पंछी रोज सपना देखता है

एक रोज टूटेगा पिंजरा और वह भर

सकेगा ऊंची उड़ान छू सकेगा आसमान।

 

निहार सकेगा धरती की खूबसूरती अपनी आंखों से चुग सकेगा अपनी चोंच से पसंद का दाना और दे सकेगा बहेलिए को चुनौती

 

जिसने कहा था उसे तुम उड़ नहीं सकते क्योंकि कतर दिए गए हैं तुम्हारे पंख पिंजरे का पंछी रोज सपना देखता है कि निकल आए हैं उसके पंख

और लंबी मुर्दा खामोशी के बाद सारा आसमान उसका है।

 

और जब ख्वाब टूटता है वह देखता है

खुद को आजाद उस भ्रम से जो उसका

पिंजरा था एक नई सुबह पंछी उड़ान भर रहा था मन की उड़ान और मैं खुश था उसे ऊंचा और ऊंचा उड़ते देखकर क्यूंकि वो पिजरे से उड़ चुका था खुले आसमान मे ।

 

स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति /

संगीता वर्मा,कानपुर उत्तर प्रदेश

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