
ख़ामोशियों की तह में दबी कोई बात पुरानी है,
साँसों की धड़कन में आज फ़िर वही रवानी है।
एक लफ़्ज़ है जो तुमसे कुछ कह नहीं सकते,
एक जुबाँ है जो तुम्हें सबकुछ बताना चाहती है।
नज़रों ने बहुत चाहा कि सब कुछ बयां कर दें,
पर पलकों के गिरते ही सारे अरमान बिखर जाते हैं।
जो लबों तक़ आते आते हर
बार ठहर जाता है,
वही अनकहा सा एहसास
आज दिल की पहचान है।
-डॉ.दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




