साहित्य

बारिश

सौ, भावना

सावन के महीने में,

जल बरसाते हैं बादल।

भीगता है मन मेरा,

भीगता आंखों का काजल।

 

खिड़की पर बैठ देखूं मैं,

रिमझिम बरसती ये बूंदें।

इस अलबेले मौसम में,

निगाहें जाने किसको ढूंढे?

 

सूखी मिट्टी के आंचल में,

बारिश की बूंदे खुश हो रही है।

अपनी सोंधी खुशबू से,

सबका मन मोह रही है।

 

बारिश अधूरे ख्वाब जगाती,

याद आती है अपनों की बातें।

गरम पकोड़े और चाय के साथ,

कितनी मधुर थी वह मुलाकातें।

 

बारिश में भीग रही वसुंधरा,

मेरा तन मन भी भीग गया है।

बारिश केवल जल नहीं अमृत है,

आत्मा को जैसे तृप्त कर गया है।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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