साहित्य

बेटी, पढ़ाई कभी धोखा नहीं देती

सपना कुमारी

सुबह का समय था। कमला रसोई में नाश्ता बना रही थी। उसकी बेटी तैयार होकर बाहर जाने लगी।

कमला ने प्यार से आवाज़ दी, “अरे बेटा, ज़रा आधा घंटा पढ़ भी लिया कर। पढ़ाई ही ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा काम आती है।”

बेटी ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ… आप जब देखो पढ़ाई के पीछे ही पड़ी रहती हो। मैं दोस्तों के पास जा रही हूँ, शाम को पढ़ लूँगी।”

तभी उसके पति ने अख़बार से नज़र उठाकर कहा, “अरे जाने भी दो न बिटिया को, कमला। क्यों हर समय पढ़ाई-पढ़ाई करती रहती हो?”

कमला कुछ पल के लिए चुप हो गई। फिर धीमी आवाज़ में बोली, “मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी वही दुख सहे जो मैंने सहे हैं।”

उसकी आवाज़ में दर्द साफ़ झलक रहा था।

वह कुछ क्षण अतीत में खो गई।

शादी के बाद उसे अक्सर ताने सुनने पड़ते थे।

“क्या मायके में सिर्फ उपले ही बनाती थी?”

“अनपढ़… गंवार कहीं की…”

ये शब्द आज भी उसके कानों में गूँजते थे। पढ़ाई पूरी न कर पाने का दर्द उसे हर दिन महसूस होता था। उसने मन ही मन तभी ठान लिया था कि उसकी बेटी कभी शिक्षा से वंचित नहीं रहेगी।

तभी पड़ोस की एक महिला घर आई और मुस्कुराकर बोली, “कमला, सुना है तुम्हारी लाडो पढ़ाई में बहुत तेज़ है।”

कमला के चेहरे पर गर्व झलक आया।

“हाँ बहन, कल ही स्कूल के हेडमास्टर कह रहे थे कि मेरी बेटी अंग्रेज़ी बहुत अच्छे से बोलती है। उन्होंने कहा कि उसमें आगे बढ़ने की पूरी क्षमता है।”

वह गर्व से बोली, “देखना… मेरी बेटी एक दिन बहुत बड़ी अधिकारी बनेगी।”

इतने में उसकी बेटी अंदर आई।

“क्या हुआ माँ? किसकी बातें हो रही हैं?”

कमला मुस्कुराई।

“बस, तेरी ही तारीफ़ कर रहे थे।”

बेटी हँस पड़ी।

“अच्छा माँ, अब मैं कोचिंग जा रही हूँ। मैं बड़ी होकर टीचर बनना चाहती हूँ।”

कमला ने तुरंत उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “ज़रूर बनना बेटा। सबसे पहले अपने पैरों पर खड़ा होना। आत्मनिर्भर लड़की किसी पर बोझ नहीं होती। मुझे आज भी इस बात का दुख है कि अगर मुझे पढ़ने का पूरा अवसर मिला होता, तो शायद मेरी ज़िंदगी कुछ और होती। इसलिए मैं चाहती हूँ कि तुम्हारे सपने पूरे हों।”

बेटी ने माँ को गले लगाया और कोचिंग के लिए निकल गई।

कमला की आँखों में चमक थी।

उसे लगा जैसे उसकी अधूरी इच्छाएँ बेटी के सपनों में नई उड़ान पा रही हैं।

उसी समय टीवी पर समाचार शुरू हो गया।

समाचार वाचक की गंभीर आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी—

“दहेज उत्पीड़न का एक और मामला सामने आया है। बी.टेक. की डिग्री प्राप्त युवती की शादी को अभी कुछ ही समय हुआ था। आरोप है कि दहेज की माँग को लेकर उसे प्रताड़ित किया गया और उसकी मौत हो गई। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।”

कमला का हाथ रिमोट पर ही रुक गया।

पति बोले, “अरे आवाज़ कम करो, कितना शोर है।”

कमला ने कहा, “ज़रा सुनने दीजिए… क्या बता रहे हैं?”

वह पूरी खबर ध्यान से सुनती रही।

समाचार समाप्त होते ही उसके मन में अनगिनत सवाल उठने लगे।

वह सोचने लगी—

“जब एक पढ़ी-लिखी, इंजीनियर बेटी भी दहेज के लालच का शिकार हो सकती है, तो आखिर कमी कहाँ है? शिक्षा ज़रूरी है, आत्मनिर्भरता भी ज़रूरी है, लेकिन क्या केवल डिग्री से समाज की सोच बदल जाती है?”

उसकी आँखों में आँसू भर आए।

उसे अपनी बेटी का चेहरा याद आया।

मन ही मन उसने भगवान से प्रार्थना की—

“हे प्रभु, मेरी बेटी को इतना सक्षम बनाना कि वह अपने फैसले खुद ले सके। उसे ऐसी जगह मिले जहाँ उसका सम्मान हो, उसके सपनों की कद्र हो और उसे कभी दहेज या किसी अन्य कारण से अपमान न सहना पड़े।”

वह गहरी सोच में डूब गई।

उसे लगा कि समय बदल गया है, लड़कियाँ पढ़ रही हैं, बड़े-बड़े पदों पर पहुँच रही हैं, अपने परिवार का नाम रोशन कर रही हैं। फिर भी कई जगहों पर दहेज, लालच और हिंसा जैसी बुराइयाँ पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

वह बुदबुदाई—

“पहले कई बहुएँ इसलिए अत्याचार सहती थीं क्योंकि वे पढ़ी-लिखी नहीं थीं, अपने अधिकार नहीं जानती थीं। आज बहुत-सी महिलाएँ पढ़ी-लिखी हैं, अपने अधिकार भी जानती हैं। फिर भी अत्याचार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बस उसका रूप बदल गया है।”

कमला ने आँसू पोंछे और खुद से कहा—

“इसीलिए मैं अपनी बेटी को केवल किताबों की शिक्षा नहीं दूँगी। उसे आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, सही निर्णय लेने की क्षमता और अन्याय के सामने आवाज़ उठाना भी सिखाऊँगी। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत होगी।”

खिड़की से बाहर देखते हुए उसके चेहरे पर चिंता भी थी और उम्मीद भी। उसे विश्वास था कि एक दिन ऐसा समाज बनेगा जहाँ किसी बेटी की कीमत दहेज से नहीं, उसके व्यक्तित्व, शिक्षा और इंसानियत से आँकी जाएगी।

नाम सपना कुमारी कोल्हापुर

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