
1
पासा वक्त का
पलटेगा जरूर
इसलिये
बोना वही
जो काट सको।
2
सब की असलियत
बताता है वक्त
बड़े बड़ों के मुलम्मे
हटाता है वक्त।
3
अहंकार के समन्दर ने
बड़े बड़े को डुबोया है
जरा रूबरू हो सच्चाई से,
तभी तो समझेगा,
क्या पाया क्या खोया है।
4
अहंकार सत्य से
डरता है।
इसीलिए तो चमचों को
लिए फिरता है।
5
अगर प्यार है
तुझको खुद से
आईना अपनी ओर कर
चल संभल के।
6
बडा़ महंगा शौक है
ईमानदारी।
हर किसी की औकात नहीं
इसे पालने की।
7
तारीफ के बिना
कोई खुश नहीं होता
झूठ के बिना
तारीफ नहीं होती
आसान कहाँ है
सच बोलना ।
8
गुनाह है
ज्यादा अच्छा होना
पता नहीं
लोग कद्र कर रहे हैं
या इस्तेमाल।
फूल गवाह हैं इसके
तोड़े वही जाते हैं
जो अच्छे होते हैं।
9
हमदर्द है
तो बातों के झुनझुने
मत बजा,पास बैठ।
मेरा थोडा़ सा जहर ,
तू भी पी के दिखा।
10
आईना बेचारा,
कैसे जानेगा।
कुछ चेहरे
चेहरों के अंदर होते हैं।
हंसते होंठों में,
व्यथा के समंदर होते हैं।
11
बेमानी है कितनी,
खुशियों की तलाश।
मरीचिका है यह,
हर कोई इसके लिए
दुखी है।
12
रेत सी
फिसल रही है
ज़िंदगी।
सफ़र उम्र का जारी है।
ख्वाहिशें बेइंतहा हैं,
क्या फिजू़ल मारा मारी है।
13
देख पराई चुपड़ी को,
क्यों जलता है जी।
मर्ज लाइलाज है यह,
अपनी हैसियत पहचान,
उसी में जी।
14
लंबा धागा लंबी जुबान,
परेशानी का सबब है।
धागे को लपेट ले,
जुबान को समेट ले
इसी में सुख है।
15
वो मेरा करीबी है,
पर गरीब है।
इसलिए नहीं उससे
मेरा कोई नाता ,
अमीर है वह,
बहुत दूर का
रिश्ता है मेरा उससे,
वह मुझे बहुत-बहुत
भाता।
16
नफ़रत तो ईमानदारी से
निबाहो दोस्तों,
दिखावे के अपनेपन से
बाज आओ।
अपने को अपनी
नज़र में ,
कब तक गिराओगे?
सलाम करूँगा,
नफरत को तेरी,
गर उसे मोहब्बत से
निभाओगे।
17
कद्र करने वालों की
कोई कद्र नहीं करता।
दुष्ट ग्रहों को ही
रिझाते हैं सभी।
सीधे तो मुरगी होते हुए
भी दाल के सांचें
में फिट हो जाते हैं।
18
नेकी कर
दरिया में डाल
कोई इसे याद रखेगा
ऐसी गलत फहमी
मत पाल।
19
जमाने को खुश करना
तेरी जिम्मेदारी नहीं।
अपने को खुश रख,
समझदारी है यही।
20
कागज पे बैठे,
अश्कों से तर
अल्फाज़ मेरे
सच की बयानी है।
कुछ दर्द दूसरों का
चुराया है।
कुछ मेरी कहानी है।
21
मुझे जानना
बहुत ही आसान है।
बस दिल की सुन
दिमाग तोअजनबी
ही बनाएगा।
प्रेम की संकरी गली में,
उलझाव कैसे समाएगा।
22
शरीफ तो
वही है आज
जिसके राज फाश नहीं हैं।
चेहरे पे मुखौटे हैं
नाक रखे जेब में,
शरा़फत का तो अब
अंदाज़ यही है।
23
बेगुनाही जब सजा़,
काट कर आई,
तो पिंजरे के पंछी
उड़ा दिए सारे
आंसू की नमकीनी ने
चख जो लिया था
मिठास-कड़वाहट को ।
24
शुक्र कर
इस बात का,
कोई रोकता
टोकता है तुझे
बाग़बान के बिना।
बाग जल्दी उजड़ जाते हैं।
जिंदगी के भटकाव को
ये अनुभव ही सुलझाते हैं।
25
आशिक
या शायर
नहीं हूँ मैं।
मेरी नींद तो मेरी
भूख ने चुरा ली है
चाँद मुझे रोटी सा
लगने लगा है
तारे अंगीठी हैं
जिस पर रखी
पतीली खाली है।




