
धर्म पुकारे, रण पुकारे, जागो भारत के वीरों,
शंख बजा माधव ने, तोड़ो भय के सब जंजीरों।
जब-जब सत्य लहूलुहान हो, अन्याय अट्टहास करें,
तब-तब कृष्ण पुकारें—”उठो! अब धर्म का प्रकाश धरें।”
केशव बोले—
“कब तक मौन रहोगे पार्थ? कब तक देखोगे अत्याचार?
जब सीमा पर संकट छाया, क्यों बैठा है वीर लाचार?”
उठो, गाण्डीव फिर सँभालो, रण का फिर उद्घोष करो।
अधर्मी के हर अभिमान का, क्षणभर में ही नाश करो।
मत सोचो कितने अपने हैं, कितने रिश्ते, कितने नाम,
जो धर्मपथ में बाधा बन जाए, उसका केवल एक परिणाम।
गीता का उद्घोष अमर है, कर्म ही जीवन का सार।
जो अन्याय सहन करे, वह होता है दोषी अपार।
सुदर्शन फिर घूमे ऐसा, काँपे हर अन्यायी सिंहासन,
सत्य ध्वजा फिर लहराए, गूँजे भारत का अभिनंदन।
आज नहीं तो फिर कब जागोगे?
कब तक सोए रह जाओगे? कृष्ण पुकार रहे हैं तुमको,
“धर्म हेतु रण में आओगे!”
जहाँ-जहाँ अन्याय खड़ा हो, वहाँ-वहाँ हुंकार बने,
हर भारतवासी के भीतर, फिर से एक अर्जुन जगे।
माधव का संदेश अमर है, डरकर मत अधिकार गँवाओ। धर्म बचाना यदि है तुमको, उठो वीरों! गाण्डीव उठाओ!
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*
*सम्पर्क सूत्र 8279709465*




