
#लाठी चली, तीर चले, फिर चली तलवारें,
संसद तक गूँज उठीं जन-मन की पुकारें।
मेहनत का हर स्वप्न यहाँ क्यों रोज़ बिखरता है,
ईमानदार विद्यार्थी भीतर ही भीतर मरता है।
किसने बेची आशाओं की उजली-सी तस्वीर,
किसके कारण टूट रहा मेहनत का तक़दीर
दिल्ली की सड़कों पर जब जनसैलाब उमड़ा,
अन्याय के विरुद्ध हर नौजवान था खड़ा।
चीख रही थीं आँखें, सच का दो सम्मान,
मेहनत का हक़ लौटाओ, रख लो देश की शान।
पेपर लीक की आग में मत भविष्य जलाओ,
न्याय और पारदर्शिता का दीप फिर जलाओ।
सत्ता हो या विपक्ष, सब उत्तरदायी बनें,
युवाओं के सपनों के सच्चे रखवाले बनें।
मेहनत की जीत हो, छल का हो अंत सारा,
सच्चाई का सूरज निकले, उजियारा ही उजियारा।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश
मौलिक अप्रकाशित रचना




