साहित्य

स्वतंत्रता या स्वच्छंदता

सुमन बिष्ट

स्वतंत्र हूँ मैं, इसका मुझे गर्व है,

पर मुझे संयम का भी मर्म रहे।

जो मन चाहे, वह करूँ मैं,

कब ऐसा आज़ादी का धर्म कहे?

 

आज हवा में अजीब शोर है,

हर चेहरा अपने में चितचोर है।

सच कम, दिखावा अधिक यहाँ,

स्वच्छंदता का ही बस ज़ोर है॥

 

उद्देश्य सही है लेकिन, जब

व्यवहार उसके विपरीत करोगे।

कैसे लोग समर्थन देंगे, जब वरिष्ठों से अभद्रता, अशिष्टता करोगे॥

 

असभ्यता का बोलबाला है,

नैतिकता का चोला उतार डाला है।

कैसे विश्वास करेंगे इन पर,

इंसानियत को शर्मसार कर डाला है॥

 

तुमने वाणी को हथियार बना लिया,

कटुता को व्यवहार बना लिया।

स्वतंत्र विचारों की आड़ में, दूसरों के अपमान को अधिकार बना लिया॥

 

उड़ना है तो नभ तक उड़ो

तुम,

पर धरती से नाता मत तोड़ो।

अधिकारों की ज्योति जलाओ,

पर कर्तव्यों से मुँह मत मोड़ो॥

 

स्वतंत्रता वह दीपक है,

जो सबके जीवन को रोशन करे।

स्वच्छंदता वह चिंगारी है,

जो घर-आँगन तक भस्म करे॥

 

मान-मर्यादा से जो बँधी रहे,

वही सच्ची आज़ादी कहलाए।

जो दूसरों का मान- सम्मान रखे,

वही मानवता को अपनाए॥

 

आओ ऐसी राह चुनें हम,

जहाँ अधिकार और धर्म मिलें।

स्वतंत्र भारत का स्वप्न साकार तभी,

जब कर्तव्य से हर कर्म मिलें॥

 

याद रहे हर पीढ़ी को यह,

इतिहास सदा यही समझाता है।

स्वतंत्रता फूलों का उपवन है,

स्वच्छंदता काँटें सा उग आता है॥

 

आओ हम मिलकर प्रण यह लें,

आज़ादी का सम्मान करेंगे।

स्वतंत्र रहेंगे, स्वच्छंद नहीं,

भारत का गौरव, मान और शान बनेंगे॥

 

स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति

सुमन बिष्ट, नोएडा

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