
बरस -बरस घन,
रिमझिम- रिमझिम ।
सरस- सरस कर,
धरा का आँगन।
आया सावन।
हर्षित तरू -तृण,
पुलकित हर उर।
झूले पड़ गए,
शाख-शाख पर।
छाया नवयौवन,
प्रकृति पर।
पुष्प खिले,
ले सुरभि-गागर।
मलय बयार,
ढुलकाए इसको,
बहे मंथर -मंथर।
आए भ्रमर,
गूंजा पिक स्वर।
मयूर उमंगित,
हो नर्तित पर।
फूटे मरकत के,
शत निर्झर।
झर-झर ,झर-झर।
किश्ती कागज की ,
नाजुक सी ,चलती है ,
जल की लहरों पर।
ढुलमुल -ढुलमुल ,
अस्थिर -अस्थिर।
अनजान डगर पर।।
खोल झरोखा ,
अब अंबर का ,
भीगा -भीगा,
झाँका दिनकर।
किरणें बिखरीं।
इंद्रधनु की ,
बनी रंगोली ।
सुंदर मनहर।
आओ- आओ,
सावन प्रियवर।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली



