
मेरे ख्वाबों का सफ़र
जिंदगी ले चली, ना जाने कहाँ
चल रहा है सफ़र सुहाना मेरा,
है यह मेरे ख्वाबों का सफ़र
हो मौन मैं देख रही हूँ जहाँ।
हो रही हूँ शांत और शांत
मौसम का आनन्द ले रही हूँ यहाँ,
है कौन जो आता है स्वप्न में
है कौन जो कराता है ख्वाबों का सफ़र मुझे।
सुन रही हूँ कोयल की कूक
मस्त पवन बह रही यहाँ,
झरना बह रहा झर-झर-झर
प्रकृति का आशीष मिल रहा यहाँ।
फैली धरा पर हरियाली
लता-कुंज बने मेरे साथी,
बलखाती वल्लरियां मन मोह रही
पुष्प-पुष्प पर भ्रमर गूंज रहे।
शब्द गीत जो अभी मैंने गाये
प्रतिध्वनि सुन रही हूँ मैं यहाँ,
सुन्दर सुगंध बह रही मतवाली
वन-उपवन में खड़ी महक रही हूँ मैं।
सृष्टि की सहज-सरल- सुन्दरता
लुभा रही पल-पल मुझे,
क्या छिपा मन अंतस में मेरे
सुन्दर-सुन्दर गीत गुनगुना रही हूँ मैं।
है कौन सी यह जीवन साधना
मन ही मन सींच रही हूँ,
धीरे-धीरे आँख मूंद कर
ख्वाबों के सफ़र में खो गयी हूँ मैं।
स्वरचित
डॉ. प्रभा जैन “श्री ”
देहरादून




