साहित्य

कागज़ी टास्क फोर्स नहीं जमीनी जनआंदोलन

कुमुद रंजन सिंह

कागज़ी टास्क फोर्स नहीं, जमीनी जनआंदोलन चाहिए: तभी बचेगा बचपन

— कुमुद रंजन सिंह, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय

प्रतिवर्ष 4 जून को “आक्रमण के शिकार निर्दोष बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस” मनाया जाता है। सामान्यतः इस दिवस को युद्ध और सशस्त्र संघर्षों में प्रभावित बच्चों से जोड़कर देखा जाता है, किंतु भारत जैसे विकासशील देश में बच्चों पर होने वाले आक्रमण का स्वरूप कहीं अधिक व्यापक और चिंताजनक है। यहां बाल श्रम, बाल विवाह, बाल तस्करी, बाल भिक्षावृत्ति, साइबर शोषण, कुपोषण, विद्यालय छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति तथा घरेलू हिंसा भी बच्चों पर होने वाले सामाजिक आक्रमण के ही रूप हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्यों में शामिल हैं। दोनों राज्यों में करोड़ों बच्चे निवास करते हैं, जो राष्ट्र की भावी शक्ति हैं। इसके बावजूद आज भी अनेक बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान जैसे मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार बाल विवाह, कुपोषण और बाल श्रम जैसी चुनौतियां अभी भी इन राज्यों में गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बनी हुई हैं।

सरकार द्वारा बाल संरक्षण के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं। बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम तथा पॉक्सो अधिनियम जैसे मजबूत कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। जिला स्तर पर टास्क फोर्स, धावा दल (Raid Team), बाल संरक्षण समितियां तथा विभिन्न विभागीय तंत्र भी गठित किए गए हैं। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि इन व्यवस्थाओं की सक्रियता आम जनता को कितनी दिखाई देती है?

वास्तविकता यह है कि अधिकांश जिलों में टास्क फोर्स और धावा दल की गतिविधियां बैठकों, कार्यवृत्तों और सरकारी फाइलों तक सीमित होकर रह जाती हैं। गांवों, कस्बों, बाजारों, ढाबों, ईंट-भट्ठों, निर्माण स्थलों और छोटे उद्योगों में बाल श्रम की मौजूदगी आज भी एक कठोर सच्चाई है। बाल विवाह की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं। यह स्थिति बताती है कि केवल प्रशासनिक संरचना बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे धरातल पर सक्रिय और जवाबदेह बनाना भी आवश्यक है।

जब तक श्रम विभाग, शिक्षा विभाग, पुलिस प्रशासन, बाल संरक्षण इकाइयां और स्थानीय निकाय मिलकर जमीनी स्तर के समाजसेवियों, स्वयंसेवी संगठनों, बाल अधिकार विशेषज्ञों, प्रशिक्षकों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों तथा जागरूक नागरिकों को इस अभियान से नहीं जोड़ेंगे, तब तक समाज में अपेक्षित गंभीरता उत्पन्न नहीं होगी।

बाल संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन का विषय है। जिस प्रकार स्वच्छता, मतदान और पोलियो उन्मूलन को जनभागीदारी से सफलता मिली, उसी प्रकार बाल श्रम, बाल विवाह और बाल शोषण के विरुद्ध भी जनआंदोलन खड़ा करना होगा।

विद्यालयों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम, ग्राम पंचायत स्तर पर बाल अधिकार संवाद, स्थानीय मीडिया की सक्रिय भागीदारी, सामाजिक संगठनों की निगरानी भूमिका तथा नागरिकों की संवेदनशीलता इस दिशा में निर्णायक सिद्ध हो सकती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बाल संरक्षण व्यवस्था को कागजों से निकालकर सड़कों, विद्यालयों, पंचायत भवनों और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाए। टास्क फोर्स की सफलता बैठकों की संख्या से नहीं, बल्कि बचाए गए बच्चों, रोके गए बाल विवाहों और पुनः विद्यालय पहुंचे बच्चों की संख्या से मापी जानी चाहिए।

यदि हम सचमुच विकसित भारत का सपना देख रहे हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों की स्थिति से तय होता है। सुरक्षित बचपन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक जीवन हर बच्चे का अधिकार है, उपकार नहीं।

बचपन की रक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी परीक्षा है। जब तक हर बच्चा सुरक्षित नहीं होगा, तब तक विकास की कोई भी कहानी अधूरी रहेगी।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!