साहित्य

जहाँ दोस्तों की महफ़िल हो

ममता झा

*जहाँ दोस्तों की महफ़िल हो*

जहाँ दोस्तों की महफ़िल हो,

वहाँ हर शाम सुहानी होती है।

हँसी के फूल बिखर जाते हैं,

हर बात कहानी होती है।

 

न कोई ऊँच-नीच का बंधन,

न मन में कोई दीवार होती है।

दिल से दिल जब मिल जाते हैं,

हर दूरी लाचार होती है।

 

कभी ठहाकों की बरसात होती,

कभी यादों की रवानी होती।

कुछ खामोशी भी बोल उठती,

जब आँखों में मेहरबानी होती।

 

ग़म भी आकर लौट ही जाते,

मुस्कानों की पहरेदारी में।

ज़िंदगी फिर खिल उठती है,

दोस्ती की फुलवारी में।

 

न दौलत का अभिमान वहाँ,

न शोहरत का कोई शोर।

सच्चे रिश्तों की खुशबू से,

महक उठता है हर एक छोर।

 

दुआ है जीवन में सदा,

ऐसे अपने साथ रहें।

जहाँ दोस्तों की महफ़िल हो,

वहाँ खुशियों के दीप जलें।

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ममता झामेधा

डालटेनगंज

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