
बचपन मैं हम हम भी
बारिश में छपाके लगाया,
करते थे,
आज इसी बारिश में
कीटाणु देखना सीख गये!!
कल ज़ब बेफिक्र थे कि
माँ क्या कहेगी, और अब
आज बारिश मैं मोबाइल बचाना सीख गये!!
पहले दुआ करते थे कि,
बरसे झमा झम वारिश,
तो छुट्टी हो जाए,
अब सोचते हैं कि रुके ये बारिश
कहीं दफ़्तर ना छूट जाये!!
कोई कोई कहता है कि,
नहीं आती वो बचपन वाली बारिश…
हम ख़ुद अब काग़ज़ की नाव, चलाना ही भूल गए!!
बारिश तो अब भी बोही बारिश ही है,
बस हम अपना ज़माना भूल गये !!
मुबारक हो ये वारिश का मौसम !!
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✍🏼पंकज एस पाण्डेय, शिकोहाबाद



