साहित्य

एक छंद को तीन छंद में बदलना भाव ज्यों के त्यों रहें

डॉमंजु गुप्ता

, 14 की मात्रा चरणान्त 3, 2 , 1 गुरु के संग छंद

 

ताटंक छंद के चरणान्त में 3 गुरु

 

लावणी छंद के चरणान्त में 1 गुरु

कुकुभ छंद के चरणान्त में 2 गुरु

 

शिव वंदना ताटंक छंद के चरणान्त में 3 गुरु

 

उष्णीशिन अनेकलोचन हे, तेरे द्वार खड़ी हूँ मैं।

अग्निषोतमात्मक अमदन हे,देना दर्श अड़ी हूँ मैं।।

अभय अनघ अतिथि अचल दाता,पापों को हर लेना तू।

करणम् कंदर्पदहन हरि हे , काशी में स्थल देना तू।।

घृष्णेश्वर रामेश्वर निष्ठुर ,लक्ष्य कलम का बन जाना हे।

ओम्कारेश्वर भीमाशंकर ,भावों में बस आना हे।।

बड़वामुख विश्वनाथ पुरुहुत, रचने का बल देना है।

बगलामुख आश्रितवत्सल हे,विघ्न सभी हर लेना है।।

*****

 

कुकुभ छंद के चरणान्त में 2 गुरु

 

उष्णीशिन अनेकलोचन हे, मैं तेरे द्वार खड़ी हूँ ।

अग्निषोतमात्मक अमदन हे, मुझ को दे दर्श अड़ी हूँ ।।

अभय अनघ अतिथि अद्रि दाता, तुम पापों को हर लेना।

करणम् कंदर्पदहन हरि हे, काशी में मुझको स्थल देना।।

 

घृष्णेश्वर रामेश्वर निष्ठुर ,लक्ष्य कलम का बन जाना ।

ओंकारेश्वर भीमाशंकर, तुम भावों में बस आना ।

 

बड़वामुख विश्वनाथ पुरुहुत, हे रचने का बल देना ।

बगलामुख आश्रितवत्सल हे, विघ्न सभी को हर लेना।।

 

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लावणी छंद के चरणान्त में 1 गुरु

 

उष्णीशिन अनेकलोचन हे ,मैं हूँ तेरे द्वार खड़ी ।

अग्निषोतमात्मक अमदन हे,मुझ को देना दर्श अड़ी।।

अभय अनघ अतिथि अद्रि दाता , मेरे पापों को हर ले।

करणम् कंदर्पदहन हरि हे, काशी में मुझ को स्थल दे।

 

घृष्णेश्वर रामेश्वर निष्ठुर, तुम लक्ष्य कलम का बन जा।

ओंकारेश्वर भीमाशंकर , तुम अब भावों में बस आ।

बड़वामुख विश्वनाथ पुरुहुत, हे तुम रचने का बल दो।

बगलामुख आश्रितवत्सल हे,विघ्न सभी को अब हर लो ।।

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डॉमंजु गुप्ता,

वाशी , नवी मुंबई

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