न छोड़ेगे हाथ मुश्किल मे भी साथ,
अगर बिके तुम तो होंगे खरीददार।
कांधे पर रख कर हाथ कैसा हैँ यार।
कायल इसी अदा के इसीलिए जमींदार।
घर हो या हो श्मशान खडे रहते यार।
आंसुओ क़ी बूंदो को बनाते दमदार।
न कोई मुहूर्त न रिश्तो का कोई सार।
बिन कहें समझ लेते नहीं होता व्यापार।
दिल क़ी बाते जुबा पर रखते तैयार।
खेल ही खेल मे दोस्ती निभाने को तैयार।
रूठें गर कभी तो मनाऊगा बार बार।
तू छुड़ा कर तो देख हाथ जाने न दूंगा यार।
प्रेम त्याग और विश्वास दोस्ती का नाम।
सजा देता जीवन पावन प्रीत का ले सार।
मीना तिवारी
पुणे




