
मेरा गाँव (1)
कहाँ गया,वह बूढ़ा बरगद
कहाँ गया,वासुदेव पीपल
कहाँ गये वो मुखिया चाचा
कहाँ गये वो हरिवंश प्रधान
प्रधान शब्द ही जिनको पाकर
हुआ था, खुद मे महान
कहाँ गये विशुनपति बाबा
कहाँ गया बबुआ का घोठा
कहाँ गये वो ताल-तलैया
कहाँ गया वो गागर-लोटा
कहाँ गये वो ‘बरम बाबा ‘
कहाँ गयी वो अमवारी
कहाँ गयी वो छठ की पूजा
कहाँ गुड़िया की तैयारी
कहाँ गये वो बड़े अलाव
जहाँ थे, हाथ सेंकते लोग
अब, दारू के संग चलता वहाँ
मछली और मीट का भोग
अब तो मिडिल,प्राईमरी के संग
चलती है, देशी की भट्ठी
ताश की गड्डी फेंटते हर दिन
रहने को भले ना झोपड़पट्टी
जर, जमीन की है लड़ाई
सब की जाती खरी कमाई
काम, क्रोध, हिंसा, द्वेष में
शहर से आगे, गाँव है भाई
अपने खेत,खलिहान संग
टिकने को, कोई नहीं राजी
दिल्ली और मुंबई में
भले बेचते सब्जी, भाजी
पर, थोड़ा सा अंतर आया है
कर्म सार्थकता लाया है
मेहनतकश के घर-आंगन में
खुशियों ने ढोल बजाया है
कुछ सामाजिक साम्य भी आया है
पक्के मकान बनवाया है
किसी की मेहनत ने रंग लाया
कहीं, जमीन खिसकाया है ।
मेरा गाँव (2)
यह गाँव है,रामबिहारी का
यह गाँव चाचा पौहारी का
राजबंशी और राजबली का
यह गाँव है राजधारी का
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है, जनपद का गहना
पोखर-ताल अभी भी भरते
सरसों पीले-पीले झरते
मटर में फूलों की बहार
फिर गेहूं की बालियां अपार
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है जनपद का गहना
दुलार साहू का देश प्रेम
कमला गोड़ का पूजा नेम
‘मृदंगी’ का ढोलक पर थाप
कवलांपति का संगीत प्रेम
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है जनपद का गहना
पूजन बनिया, रामसुभग सेठ
कपिलदेव बाबा,शिवबचन मेठ
सत्यनारायण की बुलंद वाणी
नेता का हरिओम तत्सत ठेठ
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है जनपद का गहना
यह गाँव नहीं यह कस्बा है
उन्नति का भरपूर जज्बा है
हर गाँव में बिकते हैं लड्डू
पर मेरा तो गाँव मुरब्बा है।
“मेरा गाँव” (3)
यहीं है भैया वैद्य परीक्षित
केशवचंन्द्र शुक्ल थे ‘दीक्षित’
हरगोविंद चाचा की पान;
कितने खाके हुए थे प्रमुदित
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है जनपद का गहना
खेलों की नाग पंचमी हो ली
औ’ बहुत निराली थी होली
दीपावली में दिये सजाते;
जनता अंतर से थी,भोली
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है जनपद का गहना
छेदी ठाकुर,आर.के. मास्टर
रघुनाथ चाचा, शत्रुघ्न डाक्टर
सहदेव,रामसरन कर्म-प्रवर
चलता रहा यह गाँव निरंतर
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है जनपद का गहना
सावन, कजरी और वह झूला
मन से कभी नहीं कोई भूला
बसंत पंचमी जब आती थी;
घर-घर जा खुशियों से फूला
इस गाँव का यारों क्या कहना
यह गाँव है जनपद का गहना
जनार्दन के थे नीति-बचन
अंगद जी का मानस-प्रवचन
विश्वंभर,विजयी का संकीर्तन;
यही गाँव का जीवन-दर्शन।
“मेरा गाँव” (4)
घूमें बउली,टिकुली,चपटही
बात बात बेबात बतकही
पहले आठवीं तक थी शिक्षा
अब तो बारहवीं तक हो रही
जहाँ एक दिन का था बाज़ार
प्रतिदिन अब होता गुलज़ार
फिर भी बहुत कुछ है बाकी
इसपर भी हर जन करें विचार
गाँव था रसूल की बीवी का
‘वकील’ के चना,जलेबी का
गाँव था छोटकी अहिरिन का
यह गाँव है तेली सिमरित का
सावन-भादो झूमकर बरसें
जन-जन देख देख कर हरषें
धूम धाम से कृष्ण जन्म के
होते आधी रात को जलसे
नगीना हजाम, नौबत अहीर
मित्र वशिष्ठ से हैं गंभीर-धीर
रामबली पंडित सा अब कौन
होगा त्रिकाल संध्या प्रवीण
अब कहाँ है भुतहा बारी
अब कहाँ है बड़का इनार
चलता कहाँ हाथा व ढेकुल
औ’ खेत पाटने की मारामार
‘नवनाथ के एकै नाथ’ का
उल्लेख अत्यंत जरूरी है
इसके बिना तो गाँव की
यह पावन कथा अधूरी है।
“मेरा गाँव” (5)
यह वैकुण्ठ शुकुल का गाँव
शिवपूजन बाबा का ठांव
कर्मचन्द्र, श्रीनिवास जी का
यह घोठा और बगीचा-छांव
सतुहड़,पाकड़,पीपल,नीम
समय चक्र में हुए विलीन
रात रात भर महुआ टपके
भिनसहरे सब लेते बीन
नवकी बारी, बड़की बारी
अब तो हुई समूची गायब
यही काल का रंग निराला
यही है उसका ढब, बेढब
खपरैल सारे सीमेंट हो गये
जनवासा एग्रीमेंट हो गये
देशी और अंग्रेजी शराब
गाँव का एचीवमेंट हो गये
गाँव था ब्रह्मा मुरारी का
नौरंग की नंबरदारी का
उदयभान लाल का गाँव
ग्यारहवें रूद्र त्रिपुरारी का
माँ कृष्णा का संकल्प पावन
गुलाब की निष्ठा मनभावन
हे इष्ट देव प्रभु मारूतिनंदन
बार॔बार वंदन अभिनन्दन।
मेरा गाँव (6)
कुछ बातें अभी अधूरी है
निकटता में तो अब दूरी है
मेरे गाँव पर यह कविता
कहाँ,इसके बिना पूरी है
कोदो,सावां,टांगुन,बाजरा
दिखते नहीं कहीं भी जरा
धान की खेती से हरा-हरा
सजती है मेरे गाँव की धरा
यह हरिजी पंडित का था गाँव
मोटका दुबे का वरद् छाँव
एक पांव हरदेउरा सुरजू का
करायल शुक्ल दूसरा पांव
बलुआ छोड़ चहुंओर पानी
वर्षा ऋतु की यही कहानी
कहाँ खरीफ की फसलों में
फिर से अब अगहनी आनी
कमला चौबे,शर्मा बनारसी
एक से बढ़कर एक मनीषी
और परिधि के गाँवों में थे
देवनंदन,कुबेर से महा यशी
कई नाम थे व अनगिन गुण
कार्य कुशल निष्ठा में निपुण
किये नहीं जो कभी समझौते
स्वसिद्धांतों के प्रति अक्ष्क्षुण।
“मेरा गाँव ” (7)
यह है गाँव की अकथ कहानी
अब यह सुनिये मेरी जुबानी
करायल में ईया हैं रहती
जिनको कहते पिंटू की नानी
यहाँ पर प्रदीप तिवारी रहते
ज्ञान जी से संज्ञान हैं लेते
छोटे राजन तो बड़े बन गए
व ‘बड़े’, बड़े हैं अपने बूते
गुण और धर्म में सब हैं आगे
स्वयं ‘श्रीराम’ भी यहाँ से भागे
नीति निपुण तो बृजकिशोर हैं
श्रमिक आंदोलन में थे आगे
रामसुमेर जी औ सीताराम
अनुज बीरबल तो थे शशि-श्याम
राजेश मिश्र और प्रमोद शर्मा
अब रामसरन का पौत्र प्रधान
दिवान जी का सामाजिक रंग
साथ में बाला जी का सत्संग
बीडीओ ब्लाक करायल के
बिन तो मेहनत का फीका रंग
तरूणेंद्र नेता,जगदंबा बाबा
करोड़पति है यहाँ का राजा
प्रगति पथ पर अग्रसर है गाँव
निरंतर बजे लोक-धुन-बाजा।
“मेरा गाँव “(8)
हर गाँव में पिसान है उड़ता
यहाँ पर जांता उड़ता है
मुंशी जी की कहावत है यह
पर सच्चाई से ही नाता है
मेघू चाचा औ नंदलाल जी
अखिलेश वकील, गोपाल जी
सारथि तो केवल घनश्याम
हे पवन सुत,बजरंग बली जी
भरता रहे अन्न से कोठार
जब फसलो की लगे बहार
सौहार्दपूर्ण माहौल में तो
हर दिन बन जाता त्योहार
परशुराम नेता जी के बिना
यह कविता तो हुई अधूरी है
कभी शब्द-परशु गहना भी
कविता की ही मजबूरी है
पप्पू डाक्टर,रामशृंगार मास्टर
पप्पू शुक्ल,रामसकल मास्टर
कर्मठों की धरती यह पावन
जो कर्म किया, वो पहुँचा शिखर
शहरों में गति,गाँव में यति है
प्रश्नचिन्ह भी औ सन्मति है
कुछ बचा हुआ है भाईचारा
यही गाँव की सुखद नियति है।
रविशंकर शुक्ल
कृष्णायन, म.नं.एम-2/67
जवाहर विहार कालोनी रायबरेली-229010
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