
इस चित्र में देख में जिनको देख रहे हैं आप वह हैं एक वीरता की मिसाल स्व. कमलेश कुमारी जी
जब संसद पर हमला याद होगा तो आतंकवादियों की पहली गोली खाने वाली भी याद होनी चाहिए।
परन्तु इस धुरंधर वीरता की मिसाल को प्रोपेगंडा साबित करने में तुले हुए लोगों को याद नही होंगी कमलेश कुमारी क्योंकि ये लोग तो मिट्टी में शामिल है सबका खून वाली बकवास करते हैं देते हैं जबकी इनके सात पुश्तों में से किसी ने भी देश के लिए नाखून तक की शहीदी नही दी होगी।लेकिन सच तो यह है कि हमारे इतिहास में ऐसे अनगिनत बलिदान दर्ज हैं जिन्हें हम प्रायः भूल चुके या भूल जाते हैं।इनको याद रखना चाहिए क्योंकि ये प्रचार नहीं राष्ट्र की चेतना को जागृत रखने वाले हैं।
दिनांक – 13 दिसम्बर 2001
दिल्ली की सर्द धुंध में संसद भवन कामकाज में व्यस्त था भीतर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी,लालकृष्ण आडवाणी सहित देश के शीर्ष नेता मौजूद थे। बाहर गेट पर सुरक्षा संभाल रही थीं CRPF की ब्रावो कंपनी की बहादुर सिपाही कॉन्स्टेबल कमलेश कुमारी।गेट नंबर 1 पर तैनात कमलेश कुमारी ने अचानक एक सफेद एंबैसडर कार को तेजी से सुरक्षा घेरा तोड़ते देखा नंबर था DL 3CJ 1527
उनकी चौकन्नी निगाहें तुरंत समझ गई कि यह सामान्य हरकत नहीं है।कमलेश कुमारी के हाथ में हथियार नहीं था मात्र वायरलेस था परन्तु वो भांप चुकी थी खतरे को कि ये वाहन संसद के अंदर घुसने नही देना है उन्होंने दौड़कर गेट बंद कर दिया बाकी शोर मचा कर और वायरलेस पर जवानों को चेताया,बस कुछ सेकेंड में सबको अलर्ट कर दिया,गेट बंद होने की अपरातफरी में गाड़ी जाकर टकरा गई,क्रुद्ध आतंकियों ने उन पर अंधाधुंध गोलीबारी की।
ग्यारह गोलियाँ कमलेश को लगी परन्तु उन्होंने गिरने से पहले वह कर दिखाया जिसने इतिहास में वो होने से रोक दिया जो भारत के भविष्य को बदल सकता था उनकी सतर्कता ने आतंकियों का प्लान ध्वस्त कर दिया एक आत्मघाती हमलावर संसद के भीतर विस्फोट करने वाला था यदि वह अंदर पहुँच जाता तो भारत का आज शायद कुछ और होता।
1994 में CRPF जॉइन करने वाली कमलेश कुमारी ने ड्यूटी को अपने परिवार पति- अवधेश कुमार,और बेटियों ज्योति व श्वेता से ऊपर रखा उनके बलिदान के सम्मान में 2002 में उन्हें अशोक चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया गया यह सम्मान पाने वाली वह भारत की पहली महिला कॉन्स्टेबल बनीं।
लेकिन उनकी मौत के बाद परिवार ने जाने कितने संघर्ष झेले,जब संसद हमले के दोषी अफजल की फाँसी में राजनीतिक बहसें आड़े आई परिवार ने क्षोभ में अशोक चक्र लौटाने की घोषणा की उन्होंने कहा “जिस देश के लिए कमलेश कुमारी ने जान दी” यदि वही उसके हत्यारे को सज़ा देने में देर करे तो इस सम्मान को रख कर हम क्या करेंगे”
2013 में अफजल के फाँसी पाए जाने के बाद परिवार ने सम्मान दोबारा स्वीकार किया।
कमलेश कुमारी मात्र एक कॉन्स्टेबल नहीं थीं अपितु भारत की वह पहली दीवार थीं जिस पर आतंकवाद की पहली चोट टकराकर टूट गई,उन्होंने साबित किया सबसे बड़ा हथियार बंदूक नहीं साहस होता है यही कुछ 26/11 में तुका राम ओंबले ने किया बस लाठी के दम पर उन्होने अजमल कसाब को थब तक पकड़े रहा जब तक उसकी मैगजीन खाली नही हो गई एक जीवित आतंकवादी जिसने षड़यंत्र के वो परते खोली जो अभी तक खुलती ही जा रही है।
यह सारी कहानियां प्रचार नहीं हैं यह वह सच्चाई है जो याद दिलाती है कि देश की सुरक्षा मात्र सीमाओं पर नहीं दिलों में जली उस एक लौ से भी चलती है जिसके नाम है कमलेश कुमारी,तुकाराम ओंबले,जाने वो कितने सिपाही जो हर पल हल क्षण बिना किसी स्वार्थ के लगे हुए हैं देश को बचाने में प्राण गंवाने तक।
#वन्देमातरम्,#जय_जवान,
आचार्य धीरज याज्ञिक




