
नम आँखों का अश्क, कहता एक कहानी,
बूंद-बूंद में छिपी हुई है,दिल की कोई निशानी।
हँसते हुए दर्द का आँचल, जो रोज-रोज सहलाये,
उसी मौन से आहत कितनी, गहरी लगे जुबानी।
कभी वियोग और कभी मिलन, लगता एक तराना,
कभी हृदय में उठती रहती, कोई नयी रवानी।
इन आँसुवों से जो टूटे, सपनों की सौंधी सी महक,
जग को वह नही है दिखती, मन- ही मन पहचानी।
कभी दुआ और कभी पश्चाताप,आतप की है साया,
कभी अधूरी चाह बनी है, धुंधली एक निशानी।
बूँद-बूँद में इक जीवन था,एक अनोखी व्यथा भरी,
लहर-लहर में डूबी रही जैसे , कोई अजब कहानी।
नम आँखों का अश्क है कहता,आकर एक कहानी,
जो कह न सके शब्द वही है, इक अव्यक्त सी बानी।
दया भट्ट दया




