
मैं उन दिनों लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर कक्षा में पढ़ाई कर रहा था। साथ ही साथ मैंने लखनऊ स्थित अशोक मार्ग पर चल रहे दक्षिण भारतीय भाषा विद्यालय में भी प्रवेश लिया और दो दक्षिण भारतीय भाषाएँ-तमिल और मलयालम का क्रमश: चार साल व दो साल अध्ययन किया। मुझे इन भाषाओं को सीखने में विशेष आनन्द की अनुभूति हुई। इस अवधि में मुझे विद्यालय के एक भ्रमण कार्यक्रम में दक्षिण भारत के चारों राज्यों के सत्रह जनपदों को निकट से देखने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ। इस यात्रा के दौरान दो विशेष अनुभव हुए । प्रथमत: तमिलनाडु की राजधानी तत्कालीन मद्रास (वर्तमान में चेन्न्ई) में यह देखने में आया कि वहाँ काफ़ी लोग हिन्दी जानते हुए भी तमिल भाषा में बात करना पसंद करते थे जबकि आँध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद में कई लोग हिन्दी बोलते हुए मिले। केरल और कर्नाटक में हिन्दी बोलने वालों की संख्या नगण्य ही मिली। दूसरा अनुभव कुछ अलग तरह का था। हम लोगों ने यह भ्रमण वर्ष १९७८ में किया था। हम लोग अपनी यात्रा के अगले पड़ाव में जिस दिन सुबह बंगलौर पहुँचे, वहाँ स्टेशन पर गाड़ी को रोकना पड़ा। पूरे स्टेशन पर भारी पथराव हुआ था और भवनों के टूटे हुए कांच ज़मीन पर बिखरे पड़े थे। हमें जानकारी मिली कि यह सब इन्दिरा गाँधी जी की दिल्ली में हुई गिरफ्तारी के विरोध में कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया था। हमें यह भी बताया गया कि पूरे शहर का यही हाल है और सार्वजनिक यातायात ठप हो गया है। उनकी गिरफ्तारी १९ दिसम्बर १९७८ को हुई थी जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया पूरे देश में देखने को मिली। तब एक ही विकल्प बचा था कि पैदल ही शहर में प्रवेश करके किसी धर्मशाला अथवा लाॅज में आश्रय लिया जाए! हमारे दल के सभी लोगों ने अपने सामान को स्वयं ही उठाया और चल पड़े। रास्ते में महात्मा गाँधी मार्ग भी पड़ा जहाँ के लगभग सभी भव्य शोरूम और दूकानों के शीशे पटरियों पर टूट कर बिखरे पड़े थे। निश्चित रूप से विरोध प्रदर्शन का फैलाव पूरे शहर में था। इन सबको पार करके जैसे-तैसे हम लोग एक धर्मशाला में पहुँचे और आबंटित कक्ष में अपना-अपना स्थान ग्रहण किया। अब प्रश्न यह था कि सारे दिन किया क्या जाए क्योंकि बाहर परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से ठप पड़ी थी। अगले दिन हमें अपने अगले पड़ाव अर्थात किसी अन्य शहर के लिये निकलना था। तब मैंने ही सबके सामने बाहर पैदल भ्रमण का प्रस्ताव रखा जिसे थोड़े ना-नुकुर के साथ स्वीकार कर लिया गया। हम लोगों ने वहाँ के प्रसिद्ध लालबाग उद्यान के भ्रमण का लक्ष्य बनाया और फिर निकल पड़े। धर्मशाला से यह स्थान काफ़ी दूर था, इस बात का अहसास आगे चलकर हुआ। राहगीरों से रास्ता पूछते हुए हम लोग आगे बढ़ते गये। ऐसे ही एक राहगीर मिले जिन्होंने रास्ता मौखिक बताने के बजाए स्वयं हमारे गाइड बन कर हमारे पथ प्रदर्शक के रूप में चलना प्रारम्भ कर दिया। रास्ते में उन्होंने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह एक बैंक की शाखा में शाखा प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं। यह सुनकर तो मेरे आश्चर्य की सीमा न रही! वह हम लोगों को लालबाग के समीप तक ले गये जहाँ से उसका प्रवेशद्वार दिखाई पड़ रहा था। मैंने उनका अपने हृदयतल से आभार व्यक्त किया और आगे बढ़ गये। आज भी मैं उनके गरिमामयी व्यक्तित्व एवं उनके असाधारण रूप से सहज व्यवहार को भूला नहीं हूँ। लालबाग की अप्रतिम सुन्दरता का अवलोकन करने के पश्चात हम लोग सायंकाल अपने निर्धारित स्थल को वापस आ गये। सभी बुरा तरह से थक कर चूर थे पर इस बात का भी संतोष था कि सबका दिन बेकार नहीं गया। अगले दिन हम लोग अपने अगले पड़ाव की ओर निकल पड़े। इस प्रकार दक्षिण भारत की यह यात्रा २१ दिनों में पूरी करने के उपरान्त वापस हम लखनऊ लौट आये।



