
साईकिल के पैडल मारता, गाँव की पगडंडी से घर की ओर लौटता झुमरु, आज जितना उदास था,उतने ही उदास थे उसके बंदर और बंदरिया। आज उनका खेल बिल्कुल नहीं जमा था। झुमरु रोज लौटते समय उनके लिए केले और चने खरीदता। आज उनके भी खाने की छुट्टी हो गई थी।
साईकल के कैरियर पर बैठे
चमेली और बंदरू वैसे बहुत ही नटखट थे।अक्सर किसी पेड़ के समीप से गुजरते ही कूद लगाकर उसके पत्ते तोड़ लाते। चमेली रास्ते चलते लोगों को घुड़कती। एक बार तो बंदरू पेड़ पर ही लटका रह गया। घर पहुँच कर जब झुमरू ने उसे नदारद पाया तो उसके तो होश ही उड़ गए। “बापू! क्या मेरा बंदरू खो गया?” चार साल के मुन्नू ने उदास होकर पूछा। ” ऐसे नहीं कहते बेटा। मैं अभी उसे ढूँढ कर लाता हूँ ” वह बोला और चमेली को बीवी के हवाले कर ,रास्ते भर हनुमान जी को मनाता-घबराता, सवा रूपए का परसाद बोलता, वह उलटे पाँव उसे ढूँढने निकला।
शाम के झुटपुटे में, हारा- थका निराश झुमरु वापस लौट ही रहा था कि सड़क किनारे के पेड़ पर बैठा बंदरू धप्प से उसके कंधे पर आ कूदा और उसके गले लिपट गया। उसका मन तो कर रहा था कि उसकी खासी पिटाई कर दे। पर हुआ इसका उलटा। वह तो गले से लिपटे बंदरू को अपनी गोद में लेकर फफक पड़ा।
चमेली भी कोई कम शैतान नहीं थी । जब चाहे कैरियर से कूद जाती। बंदरू को धक्का मार देती। इससे झुमरु का बैलेंस बिगड़ जाता और वह गिरते- गिरते बचता। इन परेशानियों से बचने के लिए अब झुमरु ने उन्हें एक लंबी रस्सी से बांँध कर रखना शुरू कर दिया। वे दोनों अब आपस में ही उलझे खों -खों करते रहते। झुमरू ने उन्हें कितना सिखाया कि वे इंसान की तरह हरकतें करें ,पर वे बंदर के बंदर ही रहे।
झुमरू बंदर वाला था । सवेरा होते ही नाश्ता-पानी कर,
साइकिल पर अपने बंदर-बंदरिया को बिठा कर, गाँव से बाहर के छोटे से कस्बे की और रुख करता। साईकिल के हैंडल पर लटके पुराने मैले थैले में होता बंदर के तमाशे में काम आने वाला सामान। सामान में होतीं, उनकी अजीबो गरीब पोशाकें, आईना रंग बिरंगी टोपियाँ और मालाएं,रंगीन पन्नी वाला चश्मा,कुछ टूटे- फूटे बदरंग खिलौने और एक छोटी थाली। अपने और बंदरों के लिए कुछ खाना -पानी लेकर वह निकल पड़ता और दोपहर ढले तक वापस आ जाता। वैसे अब यह काम ज्यादा नहीं चलता था। पढे़ लिखे लोग इसे पशुओं पर अत्याचार बताते थे। उसे कई बार पुलिस वालों ने धमकाया, यह खेल बंद कर देने को कहा। पर यह उसकी रोजी- रोटी थी। वह अपने काम को इतनी कुशलता और रोचक ढंग से करता कि बच्चे और बडे़ सभी उसे शौक से देखते । उसके खेल की थीम भी नई होती थीं । बंदरिया के रूठकर पीहर जाने और बंदर का उसे मनाने जाने वाला पुराना खेल नहीं दिखाता था वह। वह कोई छोटी सी कहानी या चालू फिल्मों के पसंदीदा दृश्यों को अपने अलग ही स्टाइल में दिखाता था। उसके अपने बंदरों को इसकी अच्छी ट्रेनिंग दी थीँ। इस खेल के बदले में उसे रुपए,आटा,खाने का सामान और कभी कभी पुराने कपड़े भी मिल जाते। वह अपनी इस, सीमित ज़िंदगी में ,अपनी बीवी और एक बच्चे के साथ खुश था।
पर आज का दिन ही खराब था। गाँव से बाहर निकलते ही उसकी साईकिल का टायर पंक्चर हो गया। उसे किसी तरह घसीटते- घसीटते, वह कस्बे तक पहुँचा और पंक्चर वाले के पास पंक्चर लगवाने लगा। उसकी नज़र हटते ही चमेली और बंदरू को शैतानी करने का एक मौका मिल गया। बंदरू ने वहीं खडे़ एक आदमी का थैला छीन कर उसकी तलाशी लेनी शुरू कर दी । उसके बटुए को दाँतों से फाड़ डाला और सारा सामान इधर उधर फेंक दिया ।चमेली ने आते-जाते जाते लोगों के पीछे भागना और घुड़कना शुरु कर दिया। लेकिन लंबी रस्सी के कैरियर से बंधी होने के कारण वे ज्यादा भाग नहीं सकते थे। थैले वाले ने इसका फायदा उठाया और एक बड़ी लकड़ी उठाकर ताबड़- तोड़ बेचारे बंदरू पर बरसा दीं। जब तक झुमरु उसे बचाता वह काफी पिट चुका था । चमेली ने बंदरु को बचाने के लिए , डंडे वाले आदमी के हाथ पर दाँत गड़ा दिए। खूब हाय- तौबा मची। झुमरू किसी तरह, वहाँ से भागा वरना वह भी पिट जाता ।
कस्बे में पहुँच कर उसने हमेशा की तरह अपनी डुगडुगी बजाई । थैले से खेल का सामान निकाल कर जमीन पर रखा। चमेली कूद कर रंग मंच पर आ गई ,मगर बंदरू नहीं उतरा। झुमरू ने रस्सी को जोर से खींच कर उसे उतारा और खेल दिखाना शुरू किया।
पर यह क्या बंदरु उठ ही नहीं पाया। वह गठरी बना वहीं ज़मीन पड़ा रहा। क्या माजरा है जानने के लिए जब झुमरू उसके पास गया तो देखा उसके पैर और पीठ पर काफी चोट आई थी। उसकी पीठ छिल गई थी और खून निकल रहा था। उसका मन कराह उठा। चमेली भी घबराई हुई और सुस्त थी। वह दिन भर भटका ,पर आज खेल जम नहीं पाया। कुछ कमाई नहीं हुई। खाली हाथ, भूखे पेट तीनों घर लौट आए।
घर पहुँच कर उसने बंदरू को कैरियर से उतारा और उसके खटोले पर बिठा दिया। चमेली भी कूद कर उसके पास आ बैठी। उसकी पत्नी ने रोज की तरह उनको खाना दे दिया। उसका चार बरस का बेटा , रोज की तरह बंदरु से खेलने आया। बंदरू चुप चाप बैठा रहा।
“बापू, आज बंदरू को क्या हो गया? यह मेरे साथ क्यों नहीं खेलता?” उसने पूछा।
“अरे इसे क्या हुआ? इसका पैर तो खूब सूज गया है।” उसकी पत्नी बोली। झुमरु ने सारी बात बताई।
“लगता है इसकी टाँग टूट गई है। अब यह खेल नहीं दिखा सकेगा।” वह चिंतित होकर बोला।
“अब क्या होगा? कैसे चलेगा काम?” पत्नी बोली।
“कल सुबह वैद जी से इसके पैर पर लगाने के लिए दवा ले आऊँगा। शायद दो- तीन दिन में चलने-फिरने लायक हो जाए। तब तक तू इसे हल्दी- तेल गर्म करके पट्टी बाँध दे।” वह बुझे मन से बोला।
एक सप्ताह हो गया पर बंदरू ठीक नहीं हुआ। घर में खाने के लाले पड़ गए। मजबूर होकर वह अकेली चमेली को लेकर ही खेल दिखाने निकला। पर बात नहीं बनी। बार-बार डुगडुगी बजाने पर भी कोई खेल देखने नहीं आया। हाँ, कुछ बच्चों ने पूछा जरूर “भईया, आज बंदरू को क्यों नहीं लाए? उसके बिना मजा़ नहीं आता। ” वह खाली हाथ लौट आया। घर आया, तो देखा मुन्नू बंदरू जैसी हरकतें करके बंदरू को चिढ़ा रहा था। उसकी माँ बच्चे की हरकतों पर हँस -हँस कर बेहाल हो रही थी। तभी झुमरू के मन में एक विचार तेजी से कौंध गया । जब तक बंदरू ठीक नहीं होता, तब तक क्यों न मुन्नू को ही——–।
“कल चलेगा तू, बंदरू की जगह खेल दिखाने? ” उसने मुन्नू से पूछा। और अगले दिन वह साइकिल पर चमेली और मुन्नू को लेकर कस्बे की ओर चल दिया। मुन्नू की माँ धोती के फटे पल्लू से आंँखें पोंछ रही थी। बंदरू को आदमी की हरकत करने की ट्रेनिंग देने वाला झुमरू ,आज मुन्नू को बंदर की हरकतें सिखाने को मजबूर था।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




