साहित्य

उल्लासित बीज

ऋतु गर्ग,

मैंने अंकुरण किया पहले अपने मन में,
जीवन के संचार के लिए।
बीजो को रोपा उसमें पानी देकर उल्लास के लिए,
बीज को वृक्ष बनने तक सपने सजाए हजार हमने।
उसी बीज को गमले में लगाकर सपने साकार किए,
बीज को मिट्टी में दबा कर बैठे रहे नित नई आस लगाकर।
सिंचित करते रहे खाद मिट्टी हवा पानी धूप देकर,
अंकुरन होगा आज नहीं तो कल और हम बाट निहारते रहे।
अचानक दिखाई दिया हमें एक छोटा सा अंकुरण,
मिट्टी को चीरते हुए कुछ कहते हुए।
हां !उसका अंकुरण हो चुका था और वह जीवन ले चुका था।
हां! मेरे मन में भी उल्लास जाग चुका था।
मैं भी उसको हर पल हर घड़ी देख देख कर खुश होने लगी।
कुछ अपने भाव भी लिखने लगी।
अपनी मन में सपने हजार सजाने लगी,
मेरी बगिया भी अब महकने लगी।
नित नए अंकुरण करने लगी,
कविता के रूप में ढलने लगी।
ख़ुशी से झूम उठा था मेरा मन भी, मेरे बगीचे की तरह।
मै भी माली बन चुकी थी उस पल्लव की,
जिसने मेरी राह बनाई दुनिया में जीने की।
अब वह भी बड़ा हो रहा है ,धीरे-धीरे गीत गा रहा है।
मधुबन महक रहा है, खिलता ही जा रहा है।
जीने की राह को और अधिक उल्लासमय बना रहा है ।
प्रयत्न कर रहा है, खुद को वृक्ष बनाने के लिए।
फलने फूलने के लिए बढ़ रहा है, निरंतर बढ़ता ही जा रहा है।
कविता कहानी गीत गजल के रूप लिखता ही जा रहा है।

ऋतु गर्ग, सिलीगुड़ी,पश्चिम बंगाल

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